स्कूल बस दुर्घटना के बाद प्रशासन कटघरे में, जवाबों से नहीं मिला भरोसा

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School Bus Accident

जिम्मेदारी तय करने से बचता सिस्टम, हादसे के बाद भी वही रटी-रटाई बातें

रेवाड़ी में हुए स्कूल बस हादसे ने एक बार फिर मासूम बच्चों की सुरक्षा को लेकर गंभीर चिंताएं खड़ी कर दी हैं। इस घटना के बाद प्रशासनिक तंत्र के जवाबों ने अभिभावकों और आम लोगों की नाराजगी और बढ़ा दी है। हादसे को लेकर जब जिम्मेदारी और ठोस कार्रवाई के सवाल उठे, तो अधिकारियों की ओर से वही घिसे-पिटे बयान सामने आए, जिनसे किसी ठोस सुधार की उम्मीद नजर नहीं आती।

हादसे के बाद एसडीएम की ओर से कहा गया कि प्रशासन अपना काम करता है और हर मामले में जांच की जाती है। साथ ही यह भी बताया गया कि जनवरी महीने में सड़क सुरक्षा को लेकर जागरूकता अभियान चलाया गया था और नियमों का उल्लंघन करने वालों के चालान भी किए गए थे। हालांकि, लोगों का सवाल है कि अगर अभियान और चालान इतने प्रभावी थे, तो फिर यह हादसा कैसे हुआ और बच्चों की जान जोखिम में क्यों पड़ी।

स्थानीय लोगों और अभिभावकों का कहना है कि अधिकांश स्कूल बसों की हालत जर्जर है। कई बसों में न तो सुरक्षा मानकों का पालन होता है और न ही प्रशिक्षित स्टाफ तैनात रहता है। इसके बावजूद ऐसे वाहनों को सड़कों पर दौड़ने दिया जाता है। हादसे के बाद जांच की बात करना आसान है, लेकिन हादसा होने से पहले सख्ती क्यों नहीं दिखाई जाती, यह सबसे बड़ा सवाल बना हुआ है।

अभिभावकों का आरोप है कि प्रशासन अक्सर हादसे के बाद सक्रिय होता है, लेकिन नियमित निरीक्षण और निगरानी में लापरवाही बरती जाती है। स्कूल प्रबंधन, परिवहन विभाग और स्थानीय प्रशासन के बीच जिम्मेदारी तय न होने का खामियाजा बच्चों को भुगतना पड़ता है। कुछ अभिभावकों ने मांग की है कि दोषी अधिकारियों और स्कूल प्रबंधन के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाए, ताकि भविष्य में ऐसी घटनाएं न दोहराई जाएं।

विशेषज्ञों का मानना है कि केवल जागरूकता अभियान और चालान पर्याप्त नहीं हैं। स्कूल बसों की फिटनेस, ड्राइवरों की ट्रेनिंग और सुरक्षा उपकरणों की नियमित जांच जरूरी है। जब तक इन पहलुओं पर गंभीरता से काम नहीं किया जाएगा, तब तक हर हादसे के बाद ऐसे ही औपचारिक बयान सामने आते रहेंगे और सवाल अनुत्तरित बने रहेंगे।

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