रेवाड़ी के करीब 27 साल पुराने सड़क हादसे से जुड़े मामले में हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। अदालत ने दुर्घटना में दिव्यांग हुए पीड़ित को 13.85 लाख रुपए का मुआवजा दिए जाने का रास्ता साफ कर दिया है। साथ ही मुआवजे को चुनौती देने वाली बीमा कंपनी की अपील को खारिज कर दिया गया।
यह मामला करीब 27 साल पहले हुए सड़क हादसे से जुड़ा है। दुर्घटना में पीड़ित को गंभीर चोटें आई थीं, जिनका असर उसके जीवन पर लंबे समय तक रहा। हादसे के कारण उसे दिव्यांगता का सामना करना पड़ा।
मुआवजे को लेकर मामला कानूनी प्रक्रिया में पहुंचा था। संबंधित मोटर एक्सीडेंट क्लेम ट्रिब्यूनल के फैसले के बाद विवाद हाईकोर्ट तक पहुंचा।
बीमा कंपनी ने मुआवजे से संबंधित आदेश को चुनौती देते हुए हाईकोर्ट में अपील दायर की थी। कंपनी की ओर से मुआवजे की राशि और उससे जुड़े अन्य पहलुओं पर आपत्ति जताई गई थी।
हाईकोर्ट ने मामले के रिकॉर्ड, पीड़ित की चोटों, दिव्यांगता और दुर्घटना से उसके जीवन पर पड़े प्रभाव सहित विभिन्न तथ्यों पर विचार किया।
अदालत ने बीमा कंपनी की दलीलों पर विचार करने के बाद उसकी अपील खारिज कर दी। इससे पीड़ित को ₹13.85 लाख का मुआवजा मिलने का रास्ता साफ हो गया है।
सड़क दुर्घटना में स्थायी दिव्यांगता होने पर मुआवजा तय करते समय केवल इलाज पर हुए खर्च को ही नहीं देखा जाता। पीड़ित की भविष्य की आय, काम करने की क्षमता और दैनिक जीवन पर पड़े प्रभाव जैसे पहलुओं को भी महत्व दिया जा सकता है।
दिव्यांगता के कारण किसी व्यक्ति की रोजगार क्षमता प्रभावित होने की स्थिति में उसे लंबे समय तक आर्थिक नुकसान उठाना पड़ सकता है। इसी कारण मोटर दुर्घटना मुआवजा मामलों में भविष्य में होने वाली आय की हानि महत्वपूर्ण पहलू होती है।
इस मामले में करीब तीन दशक तक चली कानूनी प्रक्रिया भी उल्लेखनीय है। दुर्घटना के 27 साल बाद हाईकोर्ट का फैसला आने से पीड़ित के लिए लंबे इंतजार के बाद राहत की स्थिति बनी है।
बीमा कंपनी की अपील खारिज होने के बाद संबंधित आदेश के अनुसार मुआवजा राशि का भुगतान किया जाना होगा। भुगतान की वास्तविक प्रक्रिया अदालत के आदेश और निर्धारित कानूनी औपचारिकताओं के अनुसार पूरी होगी।
यदि आदेश में ब्याज का प्रावधान किया गया है तो मुआवजे की अंतिम देय राशि पर उसका भी प्रभाव पड़ सकता है। इसकी सटीक स्थिति हाईकोर्ट के विस्तृत आदेश से स्पष्ट होगी।
सड़क दुर्घटना के मामलों में मोटर वाहन बीमा का उद्देश्य पात्र पीड़ितों और उनके परिवारों को आर्थिक सहायता उपलब्ध कराना भी है। दुर्घटना में मृत्यु या गंभीर दिव्यांगता होने पर मुआवजा परिवार के लिए महत्वपूर्ण आर्थिक सहारा बन सकता है।
यह फैसला लंबे समय से लंबित दुर्घटना मुआवजा मामलों की ओर भी ध्यान खींचता है। वर्षों तक चलने वाली कानूनी प्रक्रिया के दौरान पीड़ित को चिकित्सा और आर्थिक दोनों स्तरों पर चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है।
पीड़ित के लिए ₹13.85 लाख का मुआवजा उसके साथ हुई दुर्घटना और दिव्यांगता से हुए नुकसान की पूरी भरपाई तो नहीं कर सकता, लेकिन आर्थिक सहायता के रूप में महत्वपूर्ण साबित हो सकता है।
हाईकोर्ट के फैसले के बाद अब संबंधित पक्षों को आदेश का पालन करना होगा। मुआवजे की राशि कब और किस प्रक्रिया से जारी होगी, यह अदालत के विस्तृत निर्देशों के आधार पर तय होगा।
फिलहाल रेवाड़ी के 27 साल पुराने सड़क हादसा मामले में हाईकोर्ट ने बीमा कंपनी को राहत देने से इनकार करते हुए उसकी अपील खारिज कर दी है। इसके साथ ही दुर्घटना में दिव्यांग हुए पीड़ित को ₹13.85 लाख मुआवजा मिलने का रास्ता साफ हो गया है।
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