मंत्री ने सरकार से अरावली भूमि के कॉमर्शियल प्रयोग पर विचार करने का आह्वान किया
केंद्रीय मंत्री इंद्रजीत ने हाल ही में माइनिंग और पर्यावरण विवादों को लेकर एक अहम बयान दिया है। उन्होंने कहा कि मीडिया और राजनीतिक बहसों में माइनिंग को लेकर जो शोर हो रहा है, वह केवल सतही मुद्दा है। असली चिंता यह है कि अरावली क्षेत्र की जमीन का व्यावसायिक (कॉमर्शियल) उपयोग हो रहा है और इसे लेकर गंभीर विचार करने की जरूरत है।
मंत्री ने बताया कि अरावली की प्राकृतिक भूमि और हरियाली का महत्व केवल पर्यावरण संरक्षण तक सीमित नहीं है। इसका सीधे असर पानी की उपलब्धता, जैव विविधता और स्थानीय समुदायों की जीवनशैली पर भी पड़ता है। उनके अनुसार, माइनिंग विवाद इस बड़ी तस्वीर को छिपा देता है और सिर्फ कानूनी या आर्थिक पहलुओं पर ध्यान केंद्रित करवा देता है।
उन्होंने राज्य सरकार और केंद्र से आग्रह किया कि अरावली में जमीन के कॉमर्शियल प्रयोग के नियमों की समीक्षा की जाए। मंत्री ने कहा कि यदि जमीन का गैर-ज़रूरी व्यावसायिक इस्तेमाल बढ़ता रहा, तो इससे न केवल पर्यावरणीय संकट बढ़ेगा बल्कि स्थानीय जीवन और कृषि पर भी नकारात्मक असर पड़ेगा।
इस बयान के बाद राजनीतिक और सामाजिक हलकों में चर्चा तेज हो गई है। पर्यावरण विशेषज्ञ और स्थानीय समूह मंत्री के विचारों का समर्थन कर रहे हैं। उनका कहना है कि अरावली जैसे संवेदनशील क्षेत्र में केवल माइनिंग को मुद्दा बनाना सही नहीं है। वहीं कुछ उद्योग समूहों का कहना है कि आर्थिक विकास के लिए जमीन के सीमित और नियंत्रित इस्तेमाल की जरूरत है।
मंत्री इंद्रजीत के इस बयान से संकेत मिलता है कि आने वाले समय में अरावली भूमि के उपयोग को लेकर नीति और नियमन पर गंभीर बहस हो सकती है। उनका संदेश साफ है कि आर्थिक गतिविधियों और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन बनाना जरूरी है।
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