हर साल बदलता मेयर, कानून की खामी ने बनाई अनोखी व्यवस्था

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Chandigarh Mayor Election

पंजाब म्यूनिसिपल एक्ट लागू, संशोधन न होने से वार्षिक मेयर चुनाव और अलग वोटिंग सिस्टम

 

चंडीगढ़ में हर साल नए मेयर का चुनाव होना अक्सर लोगों के लिए सवाल का विषय बनता है। देश के अधिकांश नगर निगमों में जहां मेयर का कार्यकाल ढाई या पांच साल का होता है, वहीं चंडीगढ़ में यह परंपरा अलग नजर आती है। इसके पीछे की वजह कोई राजनीतिक प्रयोग नहीं, बल्कि एक कानूनी व्यवस्था और उसमें किया गया अधूरा बदलाव है।

दरअसल, चंडीगढ़ नगर निगम में पंजाब म्यूनिसिपल एक्ट लागू किया गया है। यह एक्ट मूल रूप से पंजाब के नगर निकायों के लिए बनाया गया था, जिसमें मेयर का कार्यकाल एक वर्ष निर्धारित है। जब चंडीगढ़ में यह कानून लागू किया गया, तब स्थानीय जरूरतों के अनुसार इसमें कोई संशोधन नहीं किया गया। नतीजतन, आज भी चंडीगढ़ में मेयर का चुनाव हर साल कराना अनिवार्य बना हुआ है।

इस व्यवस्था का सीधा असर नगर निगम की कार्यप्रणाली पर पड़ता है। हर साल नए मेयर के आने से नीतियों और प्राथमिकताओं में बदलाव देखने को मिलता है। कई बार लंबी अवधि की योजनाएं अधर में लटक जाती हैं, क्योंकि मेयर का कार्यकाल पूरा होने से पहले ही नेतृत्व बदल जाता है। प्रशासनिक स्थिरता को लेकर भी समय-समय पर सवाल उठते रहे हैं।

मेयर चुनाव की प्रक्रिया भी चंडीगढ़ में खास है। यहां पार्षदों द्वारा विशेष तरीके से वोटिंग कराई जाती है, जिसमें सदन की संख्या और राजनीतिक संतुलन अहम भूमिका निभाते हैं। हाल के वर्षों में मेयर चुनाव के दौरान वोटिंग प्रक्रिया, बैलेट पेपर और गिनती को लेकर विवाद भी सामने आए हैं, जिसने इस प्रणाली को और चर्चा में ला दिया है।

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि चंडीगढ़ के लिए अलग नगर निगम एक्ट बनाया जाए या पंजाब म्यूनिसिपल एक्ट में संशोधन किया जाए, तो मेयर का कार्यकाल बढ़ाया जा सकता है। इससे नगर निगम को स्थायित्व मिलेगा और विकास कार्यों को बेहतर ढंग से लागू किया जा सकेगा। हालांकि, अब तक इस दिशा में कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया है।

कुल मिलाकर, चंडीगढ़ में हर साल नया मेयर चुने जाने की परंपरा कानून से जुड़ी मजबूरी है, न कि प्रशासनिक इच्छा। जब तक एक्ट में संशोधन नहीं होता, तब तक यह व्यवस्था यूं ही जारी रहने की संभावना है।

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