न्यायिक टिप्पणी: घरेलू भूमिका को मिली कानूनी मान्यता, मुआवजा राशि बढ़ी

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सड़क हादसे के मामले में हाईकोर्ट का अहम फैसला, परिवार की आर्थिक हानि को माना

सड़क दुर्घटना से जुड़े एक अहम मामले में हाईकोर्ट ने मुआवजे की राशि को दोगुना करते हुए एक महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। अदालत ने कहा कि गृहिणी की भूमिका को केवल देखभाल तक सीमित नहीं देखा जा सकता, बल्कि वह पूरे घर की व्यवस्था और संचालन की रीढ़ होती है। इस फैसले को सामाजिक और कानूनी दृष्टि से बेहद अहम माना जा रहा है।

मामला एक ऐसे सड़क हादसे से जुड़ा है, जिसमें एक व्यक्ति की मौत हो गई थी। मृतक की पत्नी ने मुआवजे के लिए याचिका दायर की थी। पहले निचली अदालत द्वारा तय की गई राशि को अपर्याप्त बताते हुए मामले को हाईकोर्ट में चुनौती दी गई। सुनवाई के दौरान अदालत ने परिवार की वास्तविक आर्थिक और सामाजिक क्षति पर गहराई से विचार किया।

हाईकोर्ट ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि गृहिणी द्वारा किए जाने वाले कार्यों का आर्थिक मूल्य आंका जाना चाहिए। अदालत ने कहा कि वह केवल बच्चों की देखभाल या घरेलू कामकाज तक सीमित नहीं रहती, बल्कि पूरे परिवार की दिनचर्या, प्रबंधन और भावनात्मक संतुलन को संभालती है। ऐसे में पति की असमय मृत्यु से गृहिणी पर पड़ने वाले बोझ और जिम्मेदारियों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

अदालत ने यह भी माना कि हादसे के बाद महिला को अकेले परिवार की जिम्मेदारी उठानी पड़ी, जिसका सीधा असर उसकी आर्थिक और मानसिक स्थिति पर पड़ा। इन्हीं तथ्यों को आधार बनाते हुए हाईकोर्ट ने मुआवजा राशि को दोगुना करने का आदेश दिया। कोर्ट का मानना था कि पहले तय की गई राशि परिवार को हुए वास्तविक नुकसान की भरपाई के लिए पर्याप्त नहीं थी।

कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि यह फैसला भविष्य में ऐसे मामलों के लिए एक मिसाल बनेगा, जहां गृहिणियों की भूमिका को अक्सर कम करके आंका जाता रहा है। यह निर्णय न केवल मुआवजे की गणना के तरीके को प्रभावित करेगा, बल्कि समाज में घरेलू कार्यों के महत्व को भी नई पहचान देगा।

इस फैसले से पीड़ित परिवार को आर्थिक राहत मिलने के साथ-साथ न्यायिक व्यवस्था में विश्वास और मजबूत हुआ है।

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