जीते-जागते राष्ट्रपुरुष थे अटल बिहारी वाजपेयी : डॉ जंगबहादुर पांडेय

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डॉ जंग बहादुर पांडेय

जय हो जग में जले जहां भी’ नमन पुनीत अनल को।

जिस नर में भी बसे हमारा,

नमन तेज को बल को।।

किसी वृंत पर खिले विपिन में’

पर नमस्य है फूल।

सुधी खोजते नहीं गुणों का, आदि शक्ति का मूल।।

दिनकर,रश्मि-रथी, प्रथम सर्ग

सरस्वती के वरद् पुत्र पंडित अटल बिहारी वाजपेयी एक ऐसे जीते-जागते राष्ट्रपुरुष थे, जिन्होंने अपने व्यक्तित्व और कृतित्व से समय को बड़ा बना दिया और वर्तमान की समस्याओं से कभी मुंह नहीं मोड़ा। कहते हैं कि प्रतिभा कभी छुपाए नहीं छुपती, महान पुरुष के सद्गुण मृग में बसी कस्तूरी के समान होते हैं जिसकी सुगंध बरबस सबको अपनी ओर खींच लेती है। ऐसे ही राष्ट्रपुरुष थे भारत के पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी, जिनकी सरलता, सहजता, सादगी, तप, त्याग, बुद्धिमता राष्ट्रभक्ति, शिक्षा के प्रति अनन्यता और दूरदर्शिता को भारत में ही नहीं, वरन् संपूर्ण विश्व में सराहा गया। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्यकर्ता, कवि और पत्रकार के रूप में जीवन आरंभ करके राजनीति में प्रवेश करते हुए देश के प्रधानमंत्री बनने वाले अटल बिहारी वाजपेयी का जन्म 25 दिसंबर 1924  को ग्वालियर में हुआ था। उत्तर प्रदेश के आगरा जिले के बटेश्वर तीर्थ के रहने वाले इनके पिता पंडित कृष्ण बिहारी वाजपेयी ग्वालियर में अध्यापक थे। वाजपेयी जी की शिक्षा ग्वालियर और कानपुर में हुई। राजनीति शास्त्र में एमए की पढ़ाई पूरी करने के बाद जब इन्होंने कानून का अध्ययन आरंभ किया तो पिता पुत्र दोनों सहपाठी बन गए। अध्ययनोपरांत वाजपेयी जी ने पत्रकार के रूप में अपना जीवन आरंभ किया। वे 1947 से 1952 तक समय-समय पर राष्ट्रधर्म, पांचजन्य, स्वदेश और वीर अर्जुन पत्रों के संपादक रहे। सन् 1951 में भारतीय जनसंघ के संस्थापक सदस्य बने और 1968 से 1973 तक इसके अध्यक्ष भी रहे। सन् 1957 में जनसंघ के प्रत्याशी के रूप में लोकसभा के सदस्य निर्वाचित होने के साथ अटल जी का सक्रिय राजनीतिक जीवन आरंभ हुआ। 1985 को छोड़कर 1957 के बाद वे निरंतर संसद के किसी न किसी सदन के सदस्य रहते आए हैं। विपक्ष के नेता होते हुए भी उन्होंने अनेक अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत का प्रतिनिधित्व किया। सन् 1994 में वाजपेयी जी संसद की ओर से सर्वश्रेष्ठ सांसद् के रूप में सम्मानित किए गए थे। सन 1975 के आपातकाल में अटल जी जेल में बंद थे। छूटने पर फिर लोकसभा के सदस्य निर्वाचित हुए और 1977 में जनता पार्टी की सरकार में जब मोरारजी देसाई प्रधानमंत्री बने, तो वाजपेयी जी ने विदेश मंत्री का पद संभाला था। सन् 1980 में जब भारतीय जनता पार्टी का विधिवत् गठन हुआ तो अटल जी उसके प्रथम अध्यक्ष बने। वाजपेयी जी प्रथम बार 16 मई 1996 को भारत के प्रधानमंत्री बने और सदन में अपेक्षित बहुमत ना मिल पाने के कारण 28 मई 1996 को उन्हें इस्तीफा देना पड़ा। वे मात्र 13 दिन प्रधानमंत्री रहे। पुनः 19 मार्च 1999 से 2004 तक वे भारत के 10 वें प्रधानमंत्री रहे। भारतवर्ष में पंडित नेहरू से लेकर नरेंद्र मोदी तक अनेक प्रभावशाली प्रधानमंत्री हुए, लेकिन वाजपेयी जी का प्रधानमंत्री के रूप में 5 वर्षों का काल स्वर्णाक्षरों में अंकित रहेगा। उन्होंने अपने प्रधानमंत्रीत्व काल में लाहौर बस यात्रा आरंभ करके मित्र और शांति संबंधी एक कूटनीतिक कदम उठाया; परंतु पाकिस्तान ने जम्मू-कश्मीर के लद्दाख से सटे कारगिल क्षेत्र में अपनी सेनाएं भेजकर धोखा दिया, जिसके कारण भारत को एक अपरोक्ष युद्ध का सामना करना पड़ा। मगर भारतीय सेनाओं ने अपनी जांबाजी से जल्द ही उस क्षेत्र को शत्रुओं से मुक्त करा दिया और भारत की विजय हुई। आमतौर पर नेताओं की कथनी और करनी में जमीन आसमान का अंतर रहता है लेकिन वाजपेयी जी ऐसे राजनेता थे, जिनकी कथनी और करनी एक जैसी थी। उन्होंने  स्वच्छ राजनीति की और आने वाली पीढ़ी के लिए एक आदर्श प्रस्तुत किया। वाजपेयी जी ने नीति के साथ राज किया, यही उनकी राजनीति की महत्वपूर्ण विशेषता थी। उनकी सबसे बड़ी विशेषता यह  थी कि उन्होंने अपने दामन पर दाग लगने नहीं दिया। सन् 1996 में उनकी सरकार मात्र एक मत से गिर गई थी। वे चाहते तो मतदान पूर्व  जोड़-घटाव कर सकते थे, उनके सहयोगियों ने ऐसी सलाह भी दी थी; लेकिन वाजपेयी जी को उनकी सलाह गले नहीं उतर पाई और उन्होंने तत्काल राष्ट्रपति को अपना इस्तीफा सौंप दिया। वाजपेयी जी एक कुशल राजनेता के साथ-साथ एक सफल पत्रकार एवं कवि भी थे।उनकी वाणी और लेखनी में बड़ा प्रभाव था। संसद में और संसद से बाहर इनके भाषण बड़े मनोयोग से सुने जाते थे। कवि के रूप में इन्होंने अपने विद्यार्थी जीवन में ही अपना स्थान बना लिया था।इनकी कुल 19 कृतियां प्रकाशित हैं, जिनमें प्रमुख हैं-रग-रग हिंदू मेरा परिचय,मृत्यु या हत्या, अमर बलिदान(लोक सभा में अटल जी के वक्तव्यों का संग्रह), कैदी कविराय की कुंडलियां, संसद में तीन दशक,अमर आग है, कुछ लेख-कुछ भाषण, सेकुलरवाद, राजनीति के रपटीली  राहें, बिंदु-बिंदु विचार, मेरी इक्यावन  कविताएं, मेरी संसदीय यात्रा।

राजनीति में रहते हुए साहित्य की सेवा एक बहुत ही कठिन कार्य है, लेकिन अटल बिहारी वाजपेयी इस कठिन कार्य के सच्चे समाधान हैं। अटल जी की कविताओं से गुजरते हुए ऐसा लगता है मानो किसी मंजे हुए कवि की कविताओं में अवगाहन कर रहे हैं। वाजपेयी जी ने लिखा है कि “कविता मुझे विरासत में मिली है। मेरे पिता पंडित कृष्ण बिहारी वाजपेयी ग्वालियर रियासत के अपने जमाने के जाने-माने कवियों में एक थे। वे ब्रजभाषा और खड़ी बोली दोनों में लिखते थे। उनकी लिखी ईश्वर प्रार्थना रियासत के सभी विद्यालयों में सामूहिक रूप से गायी जाती थी। उनके द्वारा रचित कविता और सवैया मुझे अभी भी याद है। पितामह पंडित श्याम लाल वाजपेयी यद्यपि स्वयं कवि नहीं थे, किंतु संस्कृत और हिंदी दोनों भाषाओं के काव्य साहित्य में उनकी गहरी रुचि थी। दोनों भाषाओं के सैकड़ों छंद उन्हें कंठस्थ थे और बातचीत में उन्हें उद्धृत करते रहते थे। परिवार के साहित्यिक वातावरण का प्रभाव भाइयों पर भी पड़ा। सबसे बड़े भाई पंडित अवध बिहारी वाजपेयी कविता करने लगे।”अटल बिहारी वाजपेयी जी ने स्वयं स्वीकारा है कि कुछ मित्र कहते हैं कि यदि मैं राजनीति में ना आता तो चोटी का कवि होता। चोटी-ऐड़ी की बात मैं नहीं जानता किंतु इतना अवश्य है कि राजनीति ने मेरी काव्य रस धारा को अवरुद्ध किया है; फिर भी मैं उसे पूरी तरह अपने उदीयमान कवि को म्रियमाण करने के लिए दोषी नहीं ठहराता। उनकी एक प्रसिद्ध कविता है:

 मेरे प्रभु,

 मुझे इतनी ऊंचाई कभी मत देना गैरों को गले ना लगा सकूं

 इतनी रुखाई कभी मत देना।

वाजपेयी जी आशावादी कवि थे और भविष्य को दिशा देने वाले भी। इसीलिए फिर से दिया जलाने का भी आह्वान करते हैं:

आओ फिर से दिया जलाएं

भरी दुपहरी में अंधियारा

सूरज परछाई से हारा

अंतरतम का नेह निचोड़े

बुझी हुई बाती सुलगाए़ं।

हम पड़ाव को समझे मंजिल लक्ष्य हुआ आंखों से ओझल वर्तमान के मोह जाल में

आने वाला कल ना भुलाए

आहुति बाकी, यज्ञ अधूरा

अपनों को विघ्नों ने घेरा

अंतिम जय का वज्र बनाने

नव दधीचि हड्डियां जलाए

आओ फिर से दिया जलाएं।

वाजपेयी जी ने नए गीत का गान करते हैं। पत्थर की छाती पर दूब उगाने की बात करते हैं। काल के कपाल पर लिखने मिटाने का आह्वान करते हैं,लेकिन इस सबके लिए वे तकरार करना नहीं चाहते।

गीत नया गाता हूं

टूटे हुए तारों से फूटे बसंत स्वर पत्थर की छाती में उग आया नव अंकुर

झरे सब पीले पात,

कोयल की कूहूक रात

प्राची में अरुणिमा के रेख देख पाता हूं।

गीत नया गाता हूं

टूटे हुए सपने की सुने कौन सिसकी

अंतर की चीर व्यथा पलकों पर ठिठकी

 हार नहीं मानूंगा रार नहीं ठानूंगा काल के कपाल पर लिखता मिटाता हूं

 गीत नया गाता हूं।

आपातकाल के दौरान इंदिरा गांधी ने रातों-रात बड़े-बड़े नेताओं को जेल में बंद कर दिया था। वाजपेयी जी का भौतिक शरीर जेल में जरूर था, मगर उनकी लेखनी बंद नहीं थी और उन्होंने लिखा:

दूर कहीं कोई रोता है

 तन पर पहरा भटक रहा मन

 साथी है केवल सूनापन

 बिछड़ गया क्या स्वजन किसी का

 क्रंदन सदा करुण होता है। जन्मदिवस पर हम इठलाते

क्यों न मरण त्योहार मनाते?

 अंतिम यात्रा के अवसर पर

 आंसू का असुकून होता है।

 अंतर रोए आंख ना रोए,

 धुल जाएंगे सपने संजोए

 छलना भरे विश्व में केवल,

 सपना ही तो सच होता है।

 इस जीवन से मृत्यु भली है आतंकित जब गली गली है।

 मैं भी रोता आसपास जब,

 कोई कहीं नहीं होता है

 दूर कहीं कोई रोता है।

  वाजपेयी जी  को अनेक पुरस्कारों से नवाजा गया है।

 1पद्म विभूषण 1992

वाजपेयी जी हिंदी के यशस्वी कवि ही नहीं, अपितु  राष्ट्रभाषा हिंदी के परम हितेषी भी रहे हैं। हिंदी को विश्व भाषा बनाने के लिए उनके मन में कसक रह गई ;क्योंकि हिंदी अपने ही घर में दासी बनकर रह रही है। जब आपात् काल के दौरान वे कारागार में बंद थे और मॉरीशस में द्वितीय विश्व हिंदी सम्मेलन 1976 में संपन्न हो रहा था, तो उन्होंने जेल में हिंदी की दुर्दशा को लेकर ये पंक्तियां लिखी थीं।

बनने चली विश्व भाषा जो,

अपने घर में दासी।

सिंहासन पर अंग्रेजी है,

लखकर दुनिया हांसी,

लगकर दुनिया हांसी,

 हिंदी दा बनते चपरासी

 अफसर सारे अंग्रेजीमय,

 अवधी या  मद्रासी।

 कह कैदी कविराय,

विश्व की चिंता छोड़ो।

पहले अपने घर में,

अंग्रेजी के गढ़ को अपने तोड़ो

इतिहास ने अंगड़ाई ली और फिर आपात् काल के कैदी कविराय अटल बिहारी वाजपेयी ने 4 अक्टूबर 1977 को भारत के विदेश मंत्री के रूप में संयुक्त राष्ट्र के अधिवेशन में हिंदी में भाषण देकर दुनिया को बता दिया कि भारत गूंगा नहीं है।

गूंजी हिंदी विश्व में,स्वप्न हुआ साकार।

राष्ट्र संघ के मंच से हिंदी का जयकार

हिंदी का जयकार ,हिंद हिंदी में बोला

देख स्वभाषा प्रेम विश्व अचरज से डोला।

कह कैदी कविराय मैम की माया टूटी

भारत माता धन्य, स्नेह की सरिता फूटी।

फिर 26 वर्षों बाद 2003 में उसी विश्व पंचायत संयुक्त राष्ट्र संघ के मंच से प्रधानमंत्री के रूप में भाषण कर मान्यवर वाजपेयी जी ने अपनी मंशा और नीति को स्पष्ट कर दिया। वाजपेयी जी पहले गैर कांग्रेसी प्रधानमंत्री थे, जिन्होंने बिना किसी समस्या के 5 वर्षों तक गठ बंधन की सरकार चलायी।  उन्होंने 24 दलों के गठबंधन से सरकार बनाई थी; जिसमें 81 मंत्री थे । 2005 से वे सक्रिय राजनीति से संन्यास ले चुके थे और नई दिल्ली में 6 कृष्ण मैनन मार्ग स्थित सरकारी आवास में रहते थे। 16 अगस्त 2018 को एक लंबी बीमारी के बाद अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान दिल्ली में वाजपेयी जी का निधन हो गया।वे जीवन भर भारतीय राजनीति में सक्रिय रहे।वाजपेयी जी के निधन पर 7 दिन के राजकीय शोक की घोषणा पूरे भारतवर्ष में की गई थी। अमेरिका, चीन, बांग्लादेश, ब्रिटेन ,नेपाल ,और जापान समेत विश्व के कई राष्ट्रों द्वारा उनके निधन पर दुख जताया गया। वाजपेयी जी आशावादी कवि और राजनीतिज्ञ रहे। इसीलिए उनकी कविताओं में आशा का यही स्वर सुनाई पड़ता है:-

छोटे मन से कोई बड़ा नहीं होता।

 टूटे मन से कोई खड़ा नहीं होता।मन हार कर मैदान नहीं जीते जाते।*

 न मैदान जितने से मन ही जीता जाता है।

वाजपेयी जी आज हमारे बीच नहीं है, लेकिन उनका कृतित्व एवं स्मृतियां सदैव भारत को आलोकित करती रहेगीं। डॉ. वचन देव कुमार कहा करते थे कि बड़ा व्यक्ति वह है,  जिसकी उपस्थिति से अनुपस्थिति ज्यादा खलती है। निश्चित रूप से वाजपेयी जी की अनुपस्थिति आज देश को ज्यादा खल रही है। बंगला के सुप्रसिद्ध महाकवि माईकेल मधुसूदन दत्त ने लिखा है कि

सोई धनो नर कुले,

लोके जारे नहीं भूले।अर्थात

धन्य उसी का है यह जीवन

करता याद जिसे जन मन।

He is fortunate,who is rembered by the people even after his death.

 जय जवान, जय किसान  का नारा भूतपूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने दिया था ,लेकिन जय विज्ञान का उद्घोष करने वाले वाजपेयी जी ही थे।

लेखक : न्यूजवाणी के सलाहकार संपादक हैं

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