कारीगरों के घरों में बढ़ी रौनक
हरियाणा के Bhiwani में गर्मियों की शुरुआत के साथ ही मिट्टी के मटकों की मांग तेजी से बढ़ने लगी है। तापमान बढ़ते ही लोग ठंडा पानी पीने के लिए फिर से पारंपरिक मटकों की ओर रुख कर रहे हैं। इसके चलते कुम्हार परिवारों के घरों और कार्यशालाओं में इन दिनों काफी रौनक देखने को मिल रही है।
स्थानीय कारीगरों का कहना है कि गर्मियों का यह सीजन उनके लिए सबसे व्यस्त समय होता है। लगभग चार महीने तक लगातार मटकों, सुराहियों और कुल्हड़ों का निर्माण किया जाता है। मांग इतनी अधिक रहती है कि कई परिवार दिन-रात काम करने में जुटे रहते हैं ताकि बाजार की जरूरत पूरी की जा सके।
मटका बनाने की प्रक्रिया भी काफी मेहनत और धैर्य से भरी होती है। सबसे पहले विशेष प्रकार की मिट्टी को इकट्ठा किया जाता है, जिसे कई चरणों से गुजरना पड़ता है। कारीगर बताते हैं कि मिट्टी को साफ करने, गूंथने, छानने और तैयार करने सहित करीब 15 अलग-अलग प्रक्रियाओं से गुजरना पड़ता है। इसके बाद ही वह मटका बनाने के लिए उपयुक्त बनती है।
मिट्टी तैयार होने के बाद चाक पर मटका आकार दिया जाता है। इसके बाद इन्हें कुछ समय के लिए धूप में सुखाया जाता है और फिर भट्टी में पकाया जाता है। भट्टी में पकने के बाद ही मटके मजबूत और उपयोग के लिए तैयार हो पाते हैं।
कारीगरों के अनुसार मिट्टी के मटकों की खासियत यह है कि इनमें रखा पानी प्राकृतिक रूप से ठंडा रहता है और इसका स्वाद भी अलग होता है। यही कारण है कि आधुनिक फ्रिज होने के बावजूद कई लोग आज भी मटकों का उपयोग करना पसंद करते हैं।
कुम्हार समुदाय का कहना है कि यदि उन्हें उचित बाजार और सहयोग मिले तो यह पारंपरिक कला और अधिक लोगों को रोजगार दे सकती है। फिलहाल गर्मियों के इन महीनों में मटकों की मांग ने कारीगरों की रोजी-रोटी को मजबूती दी है।
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