नीतीश के बजट से ‘शर्माजी’ की फैमिली को क्या मिला? बेटे के लिए अच्छी नौकरी नहीं, बेटी की सुरक्षा पर चुप्पी, हां—दादाजी को 3,000 मिलें

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Bihar Budget

बिहार सरकार के नए बजट को आम आदमी की नजर से देखें तो तस्वीर कुछ ऐसी बनती है—कागजों पर बड़ी घोषणाएं, लेकिन ज़मीनी हकीकत में सीमित राहत। अगर इसी बजट को ‘शर्माजी’ की फैमिली के चश्मे से देखें, तो फायदे कम और सवाल ज़्यादा नज़र आते हैं।

बेटा:
शर्माजी का बेटा पढ़ा-लिखा है, नौकरी की तलाश में है। बजट में रोजगार सृजन की बातें तो हैं, लेकिन ऐसी ठोस योजना नहीं दिखती जिससे उसे तुरंत या भरोसेमंद तरीके से अच्छी नौकरी मिल सके। न निजी क्षेत्र के लिए बड़े प्रोत्साहन, न सरकारी भर्तियों की साफ़ समय-सीमा।

बेटी:
घर की बेटी की सुरक्षा हर परिवार की सबसे बड़ी चिंता होती है। बजट भाषण में महिला सशक्तिकरण का ज़िक्र ज़रूर है, लेकिन ज़मीनी सुरक्षा—जैसे सुरक्षित परिवहन, तेज़ न्याय, या स्थानीय स्तर पर ठोस इंतज़ाम—पर कोई स्पष्ट रोडमैप नज़र नहीं आता।

शर्माजी खुद:
महंगाई से जूझते मध्यमवर्गीय शर्माजी के लिए न टैक्स में खास राहत, न रोज़मर्रा के खर्च कम करने वाली कोई सीधी घोषणा। शिक्षा और स्वास्थ्य पर खर्च की बात तो है, पर असर कब और कैसे दिखेगा—यह साफ़ नहीं।

दादाजी:
घर में अगर कोई खुश है, तो वो हैं दादाजी। बजट में बुज़ुर्गों के लिए पेंशन बढ़ाकर 3,000 रुपये किए जाने की घोषणा से उन्हें थोड़ी राहत ज़रूर मिलेगी। दवाइयों और छोटे-मोटे खर्च में यह रकम मददगार हो सकती है।

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