नाबालिग बच्चे की कस्टडी को लेकर दायर एक अहम मामले में पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। अदालत ने नाना-नानी की ओर से दायर याचिका को खारिज करते हुए बच्चे की अभिरक्षा पिता के पास ही रहने देने का आदेश दिया है।
मामले की सुनवाई के दौरान कोर्ट ने सभी पक्षों की दलीलों को ध्यानपूर्वक सुना। नाना-नानी की ओर से बच्चे की देखभाल और उसके भविष्य को लेकर कई तर्क रखे गए थे, लेकिन अदालत ने पाया कि पिता ही बच्चे के प्राकृतिक अभिभावक (नेचुरल गार्जियन) हैं और उनके पास कस्टडी रहना उचित है।
कोर्ट ने अपने आदेश में यह भी स्पष्ट किया कि किसी भी बच्चे की कस्टडी तय करते समय उसका सर्वोत्तम हित (best interest of the child) सबसे महत्वपूर्ण होता है। न्यायालय ने माना कि इस मामले में बच्चे के हितों को ध्यान में रखते हुए पिता के पास ही उसकी देखरेख बेहतर ढंग से हो सकती है।
इस फैसले के साथ ही नाना-नानी की याचिका को खारिज कर दिया गया। हालांकि, कोर्ट ने यह भी संकेत दिया कि बच्चे के अन्य परिजनों से मिलने-जुलने के अधिकार को पूरी तरह खत्म नहीं किया जाना चाहिए, ताकि उसका भावनात्मक संतुलन बना रहे।
यह फैसला पारिवारिक मामलों में एक महत्वपूर्ण उदाहरण के रूप में देखा जा रहा है, जिसमें अदालत ने कानूनी प्रावधानों के साथ-साथ बच्चे के भविष्य और मानसिक स्थिति को प्राथमिकता दी है।
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह के फैसले समाज में पारिवारिक विवादों को सुलझाने के लिए दिशा-निर्देश का काम करते हैं।
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