बिहार में जोर पकड़ रही है आरक्षण की सीमा बढ़ाने की मांग

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महेश कुमार सिन्हा

पटना। बिहार मे आरक्षण की सीमा बढ़ाये जाने की मांग जोर पकड़ रही है। राज्य में सत्तारुढ़ महागठबंधन के सहयोगी दल इसके लिये मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और उप मुख्यमंत्री तेजस्वी यादव पर दवाब बना रहा है। हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा (हम) ने कहा है कि बिहार से ही अलग हुये झारखंड ने जिस तरह आरक्षण का दायरा बढ़ाया है,वैसी ही हिम्मत बिहार सरकार को भी दिखानी चाहिए। झारखंड सरकार ने राज्य में ओबीसी आरक्षण 14 प्रतिशत से बढ़ा कर 27 प्रतिशत कर दिया है। हाल ही में झारखंड विधानसभा में पारित एक विधेयक के अनुसार अब एससी को 28 फीसदी,एसटी को 12 फीसदी और आर्थिक रुप से कमजोर वर्गों को 10 फीसदी आरक्षणण मिलेगा। यानी झारखंड में अब कुल 77 प्रतिशत आरक्षण होगा। अभी यह 66 प्रतिशत है। आर्थिक रुप से कमजोर वर्ग को 10 फीसदी आरक्षणण देने के सुप्रीम कोर्ट के हाल के फैसले के बाद बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने भी आरक्षण की सीमा बढ़ाये जाने की आवश्यकता जतायी है। हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने इसकी सीमा 50 प्रतिशत को बरकरार रखा है। लेकिन अनेक राज्य सरकारों ने अपने राज्य में आरक्षण की सीमा बढ़ायी है। सामाजिक न्याय के नाम पर राजनीति करने वाले विभिन्न दलों के नेताओं का तर्क है कि फिलहाल छत्तीसगढ़ में 82 , तमिलनाडु में 69, महाराष्ट्र में 65 और मध्य प्रदेश में कुल 73 प्रतिशत आरक्षण है। ऐसे में बिहार में आरक्षण की सीमा क्यो नहीं बढ़ायी जा सकती है?बिहार में अभी कुल 60 प्रतिशत आरक्षण का प्रावधान है। इसमे आर्थिक रुप से कमजोर वर्ग को 10 फीसदी आरक्षण शामिल है। हम के प्रवक्ता नंदलाल मांझी का कहना है कि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार पिछड़ों के नेता माने जाते हैं। उप मुख्यमंत्री तेजस्वी यादव भी गरीबों के हितैषी हैं। इन दोनों को इस दिशा में गंभीरता से विचार करना चाहिए। मांझी ने राज्य मे आरक्षण की सीमा 60 से बढ़ा कर 77 प्रतिशत करने की मांग की है। ताकि अब तक वंचित रहे लोगों को भी इसका लाभ मिले और वे समाज की मुख्यधारा में शामिल हो सकें।

लेखक : न्यूजवाणी के बिहार के प्रधान संपादक है और यूएनआई के ब्यूरो चीफ रह चुके है।

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