सरलता, सादगी, विनम्रता और मानवता के साक्षात विग्रह थे देशरत्न डॉ राजेंद्र प्रसाद : डॉ जंगबहादुर पांडेय

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जयंती पर विशेष

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डॉ जंग बहादुर पांडेयLives of great men all remind us,We can make our lives sublime,And, departing leave behind us,Footprints on the sands of time. Longfellow Ladder of St.Augustineमहापुरुषों की जीवनियां हमें याद दिलाती हैं कि हम भी अपना जीवन महान बना सकते हैं और मरते समय अपने पद चिन्ह समय की रेत पर छोड़ सकते हैं। जिन तपस्वियों की अमर साधना से हमारी मातृभूमि अंतत: विदेशी शासन के पंजों से मुक्त हुई, उनमें देशरत्न डॉ राजेंद्र प्रसाद का नाम स्वर्ण अक्षरों में अंकित करने योग्य है। अपनी सादगी, सरलता, निस्पृहता, चारित्रिक उत्कृष्टता तथा अपूर्व देशभक्ति के कारण ये देशरत्न तथा बिहार के गांधी कहे जाते हैं। राजेंद्र बाबू की सर्वाधिक प्रमुख विशेषता यह है कि कठिन से कठिन परीक्षा की घड़ियों में भी उनके मुख मंडल पर उद्वेग की रेखा नहीं देखी गई तथा अपूर्व धीरता के साथ ही वे उसका सामना करते रहे। इनकी इन्हीं चारित्रिक विशेषताओं के कारण देश की जनता ने एकमत होकर इन्हें स्वतंत्र भारत का प्रथम राष्ट्रपति चुना। राजेंद्र बाबू का जन्म गौतम बुद्ध, अशोक, चाणक्य और चंद्रगुप्त की पुण्य भूमि बिहार में 3 दिसंबर 18 84 ई0 में छपरा जिले के जीरादेई नामक ग्राम में हुआ था। इनके पिता का नाम महादेव सहाय और माता का नाम कमलेश्वरी देवी था। इनका विवाह बचपन में ही राजवंशी देवी से हुआ था,जो बहुत पढ़ी-लिखी महिला नहीं थी, लेकिन जिनमें भारतीय नारी का गुण कूट-कूट कर भरा था। जिन्होंने जीवन पर्यंत राजेंद्र बाबू का साथ दिया और नारीत्व को कृतार्थ किया। इनकी पारिवारिक, सामाजिक और आर्थिक स्थिति अच्छी थी। इनके पूर्वज हथुआ महाराज के दीवान थे। इनकी प्रारंभिक शिक्षा उर्दू फारसी के माध्यम से शुरू हुई। वे पढ़ने में अत्यंत कुशाग्र बुद्धि के थे। स्कूल से लेकर उच्च कक्षाओं तक की परीक्षाओं में इन्होंने हमेशा प्रथम स्थान प्राप्त किया। आज भी विद्यार्थी यह याद कर आहलादित  हो जाते हैं कि उनकी ही कॉपी पर यह टिप्पणी की गई थी कि Examinee is better than Examiner अर्थात् परीक्षार्थी परीक्षक से अधिक योग्य (बेहतर) है। उन्होंने एलएलएम तथा एलएलबी की परीक्षाओं में भी प्रथम स्थान प्राप्त किया। हमेशा सर्वोच्च अंक प्राप्त करने वाले राजेंद्र बाबू जब राजनीति में आए, तो देश का सर्वोच्च पद उन्हीं को सौंपा गया। राजेंद्र बाबू का राजनीतिक जीवन अहिंसा की छत्रछाया में सुशोभित रहा, वैसे उन पर गोपाल कृष्ण गोखले का भी प्रभाव रहा, लेकिन प्रत्यक्ष रूप में वे महात्मा गांधी से अत्यधिक प्रभावित थे। विद्वता, योग्यता और समाज सेवा इनके जीवन में इस तरह से संबद्ध थे कि महानता को इनके पास आना ही था। देशभक्ति की लहर तो इनमें बचपन से ही कूट-कूट कर भरी हुई थी।अपने विद्यार्थी जीवन में ही इन्होंने कोलकाता में बिहारी छात्रों को मिलाकर बिहार क्लब बनाया था। इनमें नेतृत्व करने की अपार क्षमता थी। गांधीजी के अहिंसात्मक आंदोलन में राजेंद्र बाबू ने सक्रिय सहयोग प्रदान कर अपनी देश भक्ति और राजनीतिक दूरदर्शिता का जो परिचय दिया, वह अद्वितीय है। विनम्रता, विद्वता, नेतृत्व क्षमता और अलौकिक सूझबूझ के कारण वे संगठन के कई ऊंचे पदों पर प्रतिष्ठित हुए। वर्ष 1923 में कांग्रेस ने इन्हें अपना महामंत्री बनाया।  1942 के अगस्त क्रांति के समय राजेंद्र बाबू  की कर्मठता, दृढ़ता और संगठन शक्ति का जो परिचय मिलता है, उससे ऐसा प्रतीत होता है कि मानो अहिंसा के भीतर तूफानी ताकत बैठ कर उसे चट्टान का रूप दे रही है। इस क्रांति में राजेंद्र बाबू को 3 वर्षों के लिए कारावास जाना पड़ा।उसके पश्चात जब वे बाहर आए, तो मानो अंग्रेजों की आंच ने इन्हें और भी मजबूत बना दिया था। संस्कृत के महान नीतिकार भर्तृहरि ने नीतिशतकम् में लिखा है:-विपदि धैर्यमभ्युदये क्षमा,सदसि वाक्यपटुता युधि विक्रमः।यशसि चाभिरुचि व्यसनं श्रुतौ प्रकृतिसिद्धमिदं हि महात्मानम्।।अर्थात विपत्ति में धैर्य, अभ्युदय में क्षमा, सभा में भाषण चातुर्य, युद्ध में विक्रम, यश में अभिरुचि तथा वेद शास्त्र के अध्ययन का व्यसन ये महान पुरुषों के स्वाभाविक गुण हैं। राजेंद्र बाबू में ये गुण अनिवार्यत: समाविष्ट थे। धैर्य तो उनका आभूषण था। कई बार जेल यात्राओं को सहकर इन्होंने अहिंसात्मक आंदोलन की ज्योति जलाई। इनकी सरलता, निश्चलता और सत्य अहिंसा को देखकर महात्मा गांधी इन्हें बिहार का गांधी कह कर पुकारते थे। देश के सर्वोच्च पद पर रहने के बाद भी इनके मन में अहंकार उत्पन्न नहीं हुआ। आए हुए संकट को बड़े ही धैर्य लेकिन साहस के साथ खेल जाते थे। अंग्रेजी की कहावत है किsome persons are born great,Some persons earn greatness by their works.And greatness thrown upon some persons.अर्थात् कुछ व्यक्ति जन्म से महान होते हैं, कुछ अपने कर्मों से महानता अर्जित करते हैं और कुछ पर महानता थोप दी जाती है। राजेंद्र बाबू ऐसे इंसान थे जिन्होंने अपने कर्मों से महानता अर्जित कर मानवता को महिमामंडित किया था। स्वतंत्र भारत के प्रथम राष्ट्रपति के रूप में राजेंद्र बाबू ने अपने पद और प्रतिष्ठा  की जो गरिमा प्रदान की उससे राष्ट्रपति की कुर्सी स्वयम् महिमामंडित हो गई। भारतीय संविधान सभा के अध्यक्ष के रूप में  इन्होंने जिस विद्वता और योग्यता का परिचय दिया उसे कौन नहीं जानता? लगातार दो बार राष्ट्रपति पद पर आसीन होने वाले राजेंद्र बाबू अपनी कार्य कुशलता के लिए एक प्रतिमान के रूप में जाने जाते हैं। उनकी कार्यकुशलता, सादगी और सहनशीलता की चर्चा करते हुए राष्ट्रकवि दिनकर ने संस्मरण और श्रद्धांजलि शीर्षक पुस्तक में लिखा है कि जब राजेंद्र बाबू राष्ट्रपति हुए डॉ सच्चिदानंद सिन्हा ने उन पर एक लेख लिखा था, जिसमें उन्होंने कहा था कि राजनीति के झगड़े भयानक होते हैं, उनमें चलने वाली बहसें गर्म होती हैं और राजनीतिक संघर्ष कभी-कभी घातक भी होते हैं, किंतु राजेंद्र प्रसाद ऐसे व्यक्ति हैं जिसने तमाम विवादों में पड़कर भी किसी पर खरोंच नहीं डाली, ना जो खुद किसी खरोंच के शिकार हुए। उनमें कटुता नाम की कोई चीज नहीं है, ना राजनीतिक प्रहारों ने उन पर कोई घाव छोड़ा है।  दिनकर ने आगे लिखा है कि राजेंद्र बाबू को देश रत्न की उपाधि स्वयं महात्मा गांधी ने दी थी। वे राजेंद्र बाबू को सर्वश्रेष्ठ सहकर्मी कहा करते थे।राजेंद्र बाबू की सादगी विनम्रता और निश्चलता का आदर देश के सभी नेता आरंभ से ही करते आए हैं । सन् 1934 ईस्वी में जवाहरलाल जी ने कहा था कि राजेंद्र बाबू की आंखों में स्वयम् सत्य झांका करता है। सन् 1938 इस्वी में जब राजेंद्र बाबू दूसरी बार कांग्रेस के सभापति हुए, तब सरोजिनी नायडू ने लिखा था कि राजेंद्र बाबू के व्यक्तित्व का सही वर्णन तभी हो सकता है जब लेखक के हाथ में सोने की कलम हो और वह उसे स्याही के बदले मधु में बोर कर रचना करता हो। उनके पास जो मेघा है, वह दुर्लभ कोटि की है और उनके स्वभाव की मधुरता उससे भी अधिक अलभ्य है। उनका चरित्र उदात्त  है। अपने आप को मिटाने तथा अपने आपको उत्सर्ग करने की क्षमता भी उन्होंने असाधारण पाई है। यही कारण है कि हमारे सभी नेताओं में एक राजेंद्र बाबू ही ऐसे हैं जिन्हें लोग सबसे अधिक प्यार करते हैं। राजेंद्र बाबू धर्म प्रिय इंसान थे और धर्म के प्रति उनकी गहरी आस्था थी। वे कर्म को ही धर्म मानते थे। इसकी चर्चा करते हुए दिनकर ने लिखा है कि इन 12 वर्षों में धर्म को मुख्य प्रश्रय राष्ट्रपति भवन में मिला है और विज्ञान को प्रधानमंत्री के आवास में। भारत का भविष्य बुरा नहीं है, जहां हमारा चरित्र हमें धोखा देता है; वहां हमारी रक्षा हमारा इतिहास करता है। इतिहास ने अपनी दिशा को स्पष्ट बनाने के लिए राजेंद्र और जवाहर की जोड़ी को सिंहासन पर बिठाया था। छायावाद की सुप्रसिद्ध कवयित्री महादेवी वर्मा ने अपने एक संस्मरण में राजेंद्र बाबू के गुणों की प्रशंसा करते हुए लिखा है कि एक बार मैं राष्ट्रपति भवन में उनसे मिलने के लिए गयी। संभवतः वह एकादशी का दिन था।राष्ट्रपति भवन में राजेंद्र बाबू आलू और शकरकंद स्वयं पका कर खा रहे थे।मैं उनकी सादगी और सदाचार देखकर दंग रह गई, जहां सैकड़ों नौकर चाकर हैं, वहां स्वयं अपने हाथों पकाकर खाना कितना आश्चर्यजनक था।उनकी धर्मपत्नी राजवंशी देवी ने कहा कि इतने विशाल राष्ट्रपति भवन में चावल और दाल फटकने के लिए एक सूप नहीं है। अगली बार मैं जब राष्ट्रपति भवन गई, तो एक दर्जन सूप लेकर गई, उनकी खुशी का ठिकाना नहीं रहा। मैं कभी-कभी सोचती हूं कि विधाता के यहां ऐसे बड़े लोगों के बनाने का सांचा अब नहीं रहा। महादेवी की ये भावनाएं राजेंद्र बाबू की महानता और सदाशयता को दर्शाती हैं। मानवता का सम्मान करना राजेंद्र बाबू के लिए पूजा के समान था। उनके निवास में आम और खास में कोई अंतर नहीं होता था। देश का साधारण व्यक्ति भी राष्ट्रपति राजेंद्र बाबू के साथ दुआ-सलाम करने में तनिक हिचकता नहीं था। सम्मान के इतने बड़े पद पर रहने के बाद भी उनके लिए इंसानियत ही सबसे बड़ी दौलत थी। लोगों के दुख-दर्द को सुनकर वे द्रवित हो जाया करते थे और समाधान के उपाय भी ढूंढते थे। अपने बिहार और बिहार वासियों के प्रति उनके मन में असीम करुणा का भाव था। वे किसी भी व्यक्ति के लिए सुलभ थे। राजनीतिक व्यस्तताओं के बीच भी सामान्य लोगों के लिए अपना समय निकाल लेना उनकी बहुत बड़ी विशेषता थी। राष्ट्रपति भवन की विलासिता उन्हें छू नहीं सकी थी और इतना ऊंचा पद जिनमें अहंकार का लेश मात्र भी नहीं दे सका। इसके पीछे उनकी सादगी और विद्वता का हाथ है। विनयशीलता की मूर्ति राजेंद्र बाबू के भीतर मानवीय गुणों का भंडार था। वे 26 जनवरी 1950 से 13 मई 1962 तक भारत के राष्ट्रपति रहे और तत्पश्चात् उन्होंने डॉ राधाकृष्णन को अपना दायित्व सौंप दिया। दिल्ली का राष्ट्रपति भवन उनकी विदाई में आंसू बहाने लगा, जिस दिन वे वापस बिहार लौट रहे थे, उस दिन उनकी विदाई के लिए तो मानो संपूर्ण दिल्ली ही उमड़ पड़ी थी। सरलता और सादगी के प्रतीक राजेंद्र बाबू जब वापस विहार लौटे, तब अपने रहने के लिए उन्होंने वही पुराना सदाकत आश्रम चुना। वर्ष 1962 में जब चीन का आक्रमण हुआ, तो पटना के गांधी मैदान में भाषण देते हुए उन्होंने कहा था अहिंसा हो या हिंसा चीनी आक्रमण का सामना हमें करना है। उनका आकस्मिक निधन 28 फरवरी 1963 को हो गया। हम भारतवासी आंसू बहाते रह गए। एक सामान्य परिवार में पैदा लेकर राष्ट्रपति के ऊंचे पद तक की यात्रा करने वाले डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद सरलता व सादगी, विनम्रता और मानवता के साक्षात विग्रह थे। विद्या ददाति विनयम् के वे साक्षात उदाहरण थे। उनके जीवन का लक्ष्य था।अपनी बोली-अपना भेष,अपनी संस्कृति-अपना देश।सारे सहज़ सुखों का सार, सादा जीवन उच्च विचार।।लेखक : रांची विश्वविद्यालय के पीजी हिन्दी विभाग के पूर्व विभागाध्यक्ष तथा न्यूजवाणी के सलाहकार संपादक हैं।

डॉ जंग बहादुर पांडेय

Lives of great men all remind us,

We can make our lives sublime,

And, departing leave behind us,

Footprints on the sands of time. 

Longfellow Ladder of St.Augustine

महापुरुषों की जीवनियां हमें याद दिलाती हैं कि हम भी अपना जीवन महान बना सकते हैं और मरते समय अपने पद चिन्ह समय की रेत पर छोड़ सकते हैं। जिन तपस्वियों की अमर साधना से हमारी मातृभूमि अंतत: विदेशी शासन के पंजों से मुक्त हुई, उनमें देशरत्न डॉ राजेंद्र प्रसाद का नाम स्वर्ण अक्षरों में अंकित करने योग्य है। अपनी सादगी, सरलता, निस्पृहता, चारित्रिक उत्कृष्टता तथा अपूर्व देशभक्ति के कारण ये देशरत्न तथा बिहार के गांधी कहे जाते हैं। राजेंद्र बाबू की सर्वाधिक प्रमुख विशेषता यह है कि कठिन से कठिन परीक्षा की घड़ियों में भी उनके मुख मंडल पर उद्वेग की रेखा नहीं देखी गई तथा अपूर्व धीरता के साथ ही वे उसका सामना करते रहे। इनकी इन्हीं चारित्रिक विशेषताओं के कारण देश की जनता ने एकमत होकर इन्हें स्वतंत्र भारत का प्रथम राष्ट्रपति चुना। राजेंद्र बाबू का जन्म गौतम बुद्ध, अशोक, चाणक्य और चंद्रगुप्त की पुण्य भूमि बिहार में 3 दिसंबर 18 84 ई0 में छपरा जिले के जीरादेई नामक ग्राम में हुआ था। इनके पिता का नाम महादेव सहाय और माता का नाम कमलेश्वरी देवी था। इनका विवाह बचपन में ही राजवंशी देवी से हुआ था,जो बहुत पढ़ी-लिखी महिला नहीं थी, लेकिन जिनमें भारतीय नारी का गुण कूट-कूट कर भरा था। जिन्होंने जीवन पर्यंत राजेंद्र बाबू का साथ दिया और नारीत्व को कृतार्थ किया। इनकी पारिवारिक, सामाजिक और आर्थिक स्थिति अच्छी थी। इनके पूर्वज हथुआ महाराज के दीवान थे। इनकी प्रारंभिक शिक्षा उर्दू फारसी के माध्यम से शुरू हुई। वे पढ़ने में अत्यंत कुशाग्र बुद्धि के थे। स्कूल से लेकर उच्च कक्षाओं तक की परीक्षाओं में इन्होंने हमेशा प्रथम स्थान प्राप्त किया। आज भी विद्यार्थी यह याद कर आहलादित  हो जाते हैं कि उनकी ही कॉपी पर यह टिप्पणी की गई थी कि Examinee is better than Examiner अर्थात् परीक्षार्थी परीक्षक से अधिक योग्य (बेहतर) है। उन्होंने एलएलएम तथा एलएलबी की परीक्षाओं में भी प्रथम स्थान प्राप्त किया। हमेशा सर्वोच्च अंक प्राप्त करने वाले राजेंद्र बाबू जब राजनीति में आए, तो देश का सर्वोच्च पद उन्हीं को सौंपा गया। राजेंद्र बाबू का राजनीतिक जीवन अहिंसा की छत्रछाया में सुशोभित रहा, वैसे उन पर गोपाल कृष्ण गोखले का भी प्रभाव रहा, लेकिन प्रत्यक्ष रूप में वे महात्मा गांधी से अत्यधिक प्रभावित थे। विद्वता, योग्यता और समाज सेवा इनके जीवन में इस तरह से संबद्ध थे कि महानता को इनके पास आना ही था। देशभक्ति की लहर तो इनमें बचपन से ही कूट-कूट कर भरी हुई थी।अपने विद्यार्थी जीवन में ही इन्होंने कोलकाता में बिहारी छात्रों को मिलाकर बिहार क्लब बनाया था। इनमें नेतृत्व करने की अपार क्षमता थी। गांधीजी के अहिंसात्मक आंदोलन में राजेंद्र बाबू ने सक्रिय सहयोग प्रदान कर अपनी देश भक्ति और राजनीतिक दूरदर्शिता का जो परिचय दिया, वह अद्वितीय है। विनम्रता, विद्वता, नेतृत्व क्षमता और अलौकिक सूझबूझ के कारण वे संगठन के कई ऊंचे पदों पर प्रतिष्ठित हुए। वर्ष 1923 में कांग्रेस ने इन्हें अपना महामंत्री बनाया।  1942 के अगस्त क्रांति के समय राजेंद्र बाबू  की कर्मठता, दृढ़ता और संगठन शक्ति का जो परिचय मिलता है, उससे ऐसा प्रतीत होता है कि मानो अहिंसा के भीतर तूफानी ताकत बैठ कर उसे चट्टान का रूप दे रही है। इस क्रांति में राजेंद्र बाबू को 3 वर्षों के लिए कारावास जाना पड़ा।उसके पश्चात जब वे बाहर आए, तो मानो अंग्रेजों की आंच ने इन्हें और भी मजबूत बना दिया था। संस्कृत के महान नीतिकार भर्तृहरि ने नीतिशतकम् में लिखा है:-

विपदि धैर्यमभ्युदये क्षमा,

सदसि वाक्यपटुता युधि विक्रमः।

यशसि चाभिरुचि व्यसनं श्रुतौ प्रकृतिसिद्धमिदं हि महात्मानम्।।

अर्थात विपत्ति में धैर्य, अभ्युदय में क्षमा, सभा में भाषण चातुर्य, युद्ध में विक्रम, यश में अभिरुचि तथा वेद शास्त्र के अध्ययन का व्यसन ये महान पुरुषों के स्वाभाविक गुण हैं। राजेंद्र बाबू में ये गुण अनिवार्यत: समाविष्ट थे। धैर्य तो उनका आभूषण था। कई बार जेल यात्राओं को सहकर इन्होंने अहिंसात्मक आंदोलन की ज्योति जलाई। इनकी सरलता, निश्चलता और सत्य अहिंसा को देखकर महात्मा गांधी इन्हें बिहार का गांधी कह कर पुकारते थे। देश के सर्वोच्च पद पर रहने के बाद भी इनके मन में अहंकार उत्पन्न नहीं हुआ। आए हुए संकट को बड़े ही धैर्य लेकिन साहस के साथ खेल जाते थे। अंग्रेजी की कहावत है कि

some persons are born great,

Some persons earn greatness by their works.

And greatness thrown upon some persons.

अर्थात् कुछ व्यक्ति जन्म से महान होते हैं, कुछ अपने कर्मों से महानता अर्जित करते हैं और कुछ पर महानता थोप दी जाती है। राजेंद्र बाबू ऐसे इंसान थे जिन्होंने अपने कर्मों से महानता अर्जित कर मानवता को महिमामंडित किया था। स्वतंत्र भारत के प्रथम राष्ट्रपति के रूप में राजेंद्र बाबू ने अपने पद और प्रतिष्ठा  की जो गरिमा प्रदान की उससे राष्ट्रपति की कुर्सी स्वयम् महिमामंडित हो गई। भारतीय संविधान सभा के अध्यक्ष के रूप में  इन्होंने जिस विद्वता और योग्यता का परिचय दिया उसे कौन नहीं जानता? लगातार दो बार राष्ट्रपति पद पर आसीन होने वाले राजेंद्र बाबू अपनी कार्य कुशलता के लिए एक प्रतिमान के रूप में जाने जाते हैं। उनकी कार्यकुशलता, सादगी और सहनशीलता की चर्चा करते हुए राष्ट्रकवि दिनकर ने संस्मरण और श्रद्धांजलि शीर्षक पुस्तक में लिखा है कि जब राजेंद्र बाबू राष्ट्रपति हुए डॉ सच्चिदानंद सिन्हा ने उन पर एक लेख लिखा था, जिसमें उन्होंने कहा था कि राजनीति के झगड़े भयानक होते हैं, उनमें चलने वाली बहसें गर्म होती हैं और राजनीतिक संघर्ष कभी-कभी घातक भी होते हैं, किंतु राजेंद्र प्रसाद ऐसे व्यक्ति हैं जिसने तमाम विवादों में पड़कर भी किसी पर खरोंच नहीं डाली, ना जो खुद किसी खरोंच के शिकार हुए। उनमें कटुता नाम की कोई चीज नहीं है, ना राजनीतिक प्रहारों ने उन पर कोई घाव छोड़ा है।  दिनकर ने आगे लिखा है कि राजेंद्र बाबू को देश रत्न की उपाधि स्वयं महात्मा गांधी ने दी थी। वे राजेंद्र बाबू को सर्वश्रेष्ठ सहकर्मी कहा करते थे।राजेंद्र बाबू की सादगी विनम्रता और निश्चलता का आदर देश के सभी नेता आरंभ से ही करते आए हैं । सन् 1934 ईस्वी में जवाहरलाल जी ने कहा था कि राजेंद्र बाबू की आंखों में स्वयम् सत्य झांका करता है। सन् 1938 इस्वी में जब राजेंद्र बाबू दूसरी बार कांग्रेस के सभापति हुए, तब सरोजिनी नायडू ने लिखा था कि राजेंद्र बाबू के व्यक्तित्व का सही वर्णन तभी हो सकता है जब लेखक के हाथ में सोने की कलम हो और वह उसे स्याही के बदले मधु में बोर कर रचना करता हो। उनके पास जो मेघा है, वह दुर्लभ कोटि की है और उनके स्वभाव की मधुरता उससे भी अधिक अलभ्य है। उनका चरित्र उदात्त  है। अपने आप को मिटाने तथा अपने आपको उत्सर्ग करने की क्षमता भी उन्होंने असाधारण पाई है। यही कारण है कि हमारे सभी नेताओं में एक राजेंद्र बाबू ही ऐसे हैं जिन्हें लोग सबसे अधिक प्यार करते हैं। राजेंद्र बाबू धर्म प्रिय इंसान थे और धर्म के प्रति उनकी गहरी आस्था थी। वे कर्म को ही धर्म मानते थे। इसकी चर्चा करते हुए दिनकर ने लिखा है कि इन 12 वर्षों में धर्म को मुख्य प्रश्रय राष्ट्रपति भवन में मिला है और विज्ञान को प्रधानमंत्री के आवास में। भारत का भविष्य बुरा नहीं है, जहां हमारा चरित्र हमें धोखा देता है; वहां हमारी रक्षा हमारा इतिहास करता है। इतिहास ने अपनी दिशा को स्पष्ट बनाने के लिए राजेंद्र और जवाहर की जोड़ी को सिंहासन पर बिठाया था। छायावाद की सुप्रसिद्ध कवयित्री महादेवी वर्मा ने अपने एक संस्मरण में राजेंद्र बाबू के गुणों की प्रशंसा करते हुए लिखा है कि एक बार मैं राष्ट्रपति भवन में उनसे मिलने के लिए गयी। संभवतः वह एकादशी का दिन था।राष्ट्रपति भवन में राजेंद्र बाबू आलू और शकरकंद स्वयं पका कर खा रहे थे।मैं उनकी सादगी और सदाचार देखकर दंग रह गई, जहां सैकड़ों नौकर चाकर हैं, वहां स्वयं अपने हाथों पकाकर खाना कितना आश्चर्यजनक था।उनकी धर्मपत्नी राजवंशी देवी ने कहा कि इतने विशाल राष्ट्रपति भवन में चावल और दाल फटकने के लिए एक सूप नहीं है। अगली बार मैं जब राष्ट्रपति भवन गई, तो एक दर्जन सूप लेकर गई, उनकी खुशी का ठिकाना नहीं रहा। मैं कभी-कभी सोचती हूं कि विधाता के यहां ऐसे बड़े लोगों के बनाने का सांचा अब नहीं रहा। महादेवी की ये भावनाएं राजेंद्र बाबू की महानता और सदाशयता को दर्शाती हैं। मानवता का सम्मान करना राजेंद्र बाबू के लिए पूजा के समान था। उनके निवास में आम और खास में कोई अंतर नहीं होता था। देश का साधारण व्यक्ति भी राष्ट्रपति राजेंद्र बाबू के साथ दुआ-सलाम करने में तनिक हिचकता नहीं था। सम्मान के इतने बड़े पद पर रहने के बाद भी उनके लिए इंसानियत ही सबसे बड़ी दौलत थी। लोगों के दुख-दर्द को सुनकर वे द्रवित हो जाया करते थे और समाधान के उपाय भी ढूंढते थे। अपने बिहार और बिहार वासियों के प्रति उनके मन में असीम करुणा का भाव था। वे किसी भी व्यक्ति के लिए सुलभ थे। राजनीतिक व्यस्तताओं के बीच भी सामान्य लोगों के लिए अपना समय निकाल लेना उनकी बहुत बड़ी विशेषता थी। राष्ट्रपति भवन की विलासिता उन्हें छू नहीं सकी थी और इतना ऊंचा पद जिनमें अहंकार का लेश मात्र भी नहीं दे सका। इसके पीछे उनकी सादगी और विद्वता का हाथ है। विनयशीलता की मूर्ति राजेंद्र बाबू के भीतर मानवीय गुणों का भंडार था। वे 26 जनवरी 1950 से 13 मई 1962 तक भारत के राष्ट्रपति रहे और तत्पश्चात् उन्होंने डॉ राधाकृष्णन को अपना दायित्व सौंप दिया। दिल्ली का राष्ट्रपति भवन उनकी विदाई में आंसू बहाने लगा, जिस दिन वे वापस बिहार लौट रहे थे, उस दिन उनकी विदाई के लिए तो मानो संपूर्ण दिल्ली ही उमड़ पड़ी थी। सरलता और सादगी के प्रतीक राजेंद्र बाबू जब वापस विहार लौटे, तब अपने रहने के लिए उन्होंने वही पुराना सदाकत आश्रम चुना। वर्ष 1962 में जब चीन का आक्रमण हुआ, तो पटना के गांधी मैदान में भाषण देते हुए उन्होंने कहा था अहिंसा हो या हिंसा चीनी आक्रमण का सामना हमें करना है। उनका आकस्मिक निधन 28 फरवरी 1963 को हो गया। हम भारतवासी आंसू बहाते रह गए। एक सामान्य परिवार में पैदा लेकर राष्ट्रपति के ऊंचे पद तक की यात्रा करने वाले डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद सरलता व सादगी, विनम्रता और मानवता के साक्षात विग्रह थे। विद्या ददाति विनयम् के वे साक्षात उदाहरण थे। उनके जीवन का लक्ष्य था।

अपनी बोली-अपना भेष,

अपनी संस्कृति-अपना देश।

सारे सहज़ सुखों का सार,

 सादा जीवन उच्च विचार।।

लेखक : रांची विश्वविद्यालय के पीजी हिन्दी विभाग के पूर्व विभागाध्यक्ष तथा न्यूजवाणी के सलाहकार संपादक हैं।

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