UNESCO मीटिंग के मौके पर राजधानी में विशेष दिवाली-प्रदर्शन — सांस्कृतिक दांव या युगांतरिक पल?
इस साल दिवाली का पारंपरिक तौर पर पर्व अक्टूबर में मनाया गया था, पर 10 दिसंबर को राजधानी फिर से दीयों और रंगोली से सजेगी — और यह आयोजन धार्मिक कैलेंडर के कारण नहीं, बल्कि एक कूटनीतिक-सांस्कृतिक रणनीति के चलते है। सरकार ने यह कदम UNESCO की इंटरगवर्न्मेन्टल कमेटी की बैठक (IGC) के दौरान दिवाली को अमूर्त सांस्कृतिक विरासत की सूची में शामिल कराने की संभावित सफलता के जश्न के रूप में रखा है।
केंद्र ने दिल्ली सरकार को यह निर्देश दिया है कि 10 दिसंबर को लाल किला, राष्ट्रपति भवन और अन्य प्रमुख स्मारक विशेष रोशनी, दीये और सांस्कृतिक प्रस्तुतियों के लिये सजाए जाएँ। आयोजन का उद्देश्य दिवाली के वैश्विक प्रतीक—’अंधकार से प्रकाश की ओर’—को उजागर कर वैश्विक दर्शकों और UNESCO प्रतिनिधियों पर सकारात्मक प्रभाव डालना बताया जा रहा है। राजधानी में दिहाड़ी स्तर पर Dilli Haat और चुनिन्दा सार्वजनिक स्थानों पर भी कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे।
सरकारी बयानों के अनुसार यह एक ‘कुल्चरल पिच’ है—दिवाली को अंतरराष्ट्रीय मंच पर पहचान दिलाने हेतु एक सामूहिक, भव्य प्रदर्शनी। आयोजन की टाइमिंग IGC के एजेंडे और संभावित विचार-विमर्श के साथ मिलती है, इसीलिए 8-13 दिसंबर की बैठक के बीच 10 दिसंबर को खास प्रस्तुति तय की गई है।
हालांकि, यह कदम उत्सव-प्रेमियों को आकर्षित करने के साथ-साथ चिंताएँ भी जगाता है — खासकर वायु-गुणवत्ता और पब्लिक-सेफ्टी को लेकर। अनुभव बताता है कि दिवाली के आसपास पटाखों से तात्कालिक प्रदूषण बढ़ता है; राजधानी में हाल के वर्षों में दिवाली के बाद AQI में तीव्र उछाल दर्ज हुआ है, इसलिए प्रशासन को प्रदूषण नियंत्रण और स्वास्थ्य-संदेशों पर भी विशेष ध्यान रखना होगा।
नतीजा: 10 दिसंबर का कार्यक्रम पारंपरिक पूजा-तिथि नहीं, बल्कि सांस्कृतिक-कूटनीति का आयोजन माना जाना चाहिए — इसका मकसद दिवाली को UNESCO मान्यता दिलवाना और भारत का सांस्कृतिक संदेश विश्व पटल पर मजबूती से रखना है। आम नागरिकों से उम्मीद है कि आयोजन का आनंद लेते समय पर्यावरण और सुरक्षा के संकेतों का पालन भी किया जाएगा।
![]()











