सरस्वती के अनन्य साधक थे डॉ पांडेय ब्रह्मेश्वर विद्यार्थी

Desk Editor
Desk Editor 6 Min Read

डॉ पांडेय रविभूषण
ब्रिटिश भारत में 27 जनवरी 1928 को बिहार के पूर्वी चंपारण जिले के करमावा गांव में जन्मे डॉ पांडेय ब्रह्मेश्वर विद्यार्थी मां सरस्वती के अनन्य साधक थे।उनकी तुलना देश के पहले राष्ट्रपति डॉ राजेंद्र प्रसाद, डॉ राधाकृष्णन और डॉ सच्चिदानंद सिन्हा सरीखे विद्वानों से की जा सकती है।मैंने अपने खुद के जीवनकाल में इनके जैसा समर्पित सरस्वती का साधक और उद्भट विद्वान नहीं देखा।मैं खुद को सौभाग्यशाली मानता हूं कि मुझे उनके सानिध्य में रहने का सुअवसर प्राप्त हुआ।इससे मैं उनकी दिनचर्या से परिचित हो सका। वे रोज ब्रह्म मुहूर्त में उठकर अध्ययन करते, कुछ लिखते या टाइप करते थे। धोती-कुर्ता उनका पसंदीदा पहनावा था।इनके साथ रहकर मैं इस निष्कर्ष पर पहुंचा कि ये मां की सरस्वती की साधना में इतने तल्लीन रहा करते थे कि दुनियादारी की ओर ध्यान देने का इनके पास समय ही नहीं बचता था।अपने विषय दर्शनशास्त्र विशेषकर भारतीय दर्शन पर इनकी अद्भूत पकड़ थी। किस पुस्तक के किस पृष्ठ में किस संदर्भ का उल्लेख है यह सब उनकी स्मृति में दर्ज रहता था, उनकी प्रत्युत्पन्नमति का तो मैं कायल था। भारतीय दर्शन को जानने के लिए संस्कृत भाषा का ज्ञान अनिवार्य माना जाता है। डॉ पीबी विद्यार्थी संस्कृत के मर्मज्ञ होने के कारण अपने विद्यार्थियों को विषय आसानी से समझा देते थे। मैंने इन्हें दिनभर में चार-पांच भिन्न-भिन्न टॉपिक्स पर शोध कर रहे शोधार्थियों को धारा प्रवाह पढ़ाते हुए और डिक्टेशन देते पाया था। विद्वता, सरलता और सद्व्यवहार इनके व्यक्तित्व का हिस्सा था। रांची विश्वविद्यालय के दर्शनशास्त्र विभाग के अध्यक्ष रहने के बावजूद वे अपने जीवनकाल में सदा साइकिल पर चले। उनके संबंध में कुछ रोचक अनुभव साझा करना चाहूंगा। एक बार मैं उन्हें अपने स्कूटर पर बिठाकर रांची यूनिवर्सिटी गया था। उस समय कमिश्नर ऑफिस के सामने फल और सब्जी का बाजार लगा करता था। मैंने यहां उन्हें उतार दिया और कहा कि आप पांच मिनट के लिए रुकिए, मैं कुछ सामान लेकर आ रहा हूं। जब मैं सामान लेकर लौटा तो पाया कि सरस्वती के साधक सड़क पर बैठकर पढ़ने में तल्लीन थे। यह देखकर मेरे विस्मय की कोई सीमा नहीं रही। अपनी शिक्षकीय की जिम्मेदारी के प्रति वे इतने जवाबदेह थे कि परीक्षार्थियों की उत्तरपुस्तिका में लिखे गये उत्तर की एक-एक लाइन पढ़कर अंक देते थे।वे यूपीएससी और अन्य संस्थाओं से भी जुड़े हुए थे। कर्नाटक के अकादमी ऑफ संस्कृत रिसर्च मेलकोट के वे मानद सदस्य थे। ऐसे में उन्हें ट्रेन में सफर के लिए प्रथम श्रेणी का किराया और भत्ता मिलता था। पर वे द्वितीय श्रेणी से यात्रा करते थे और इस तरह जो पैसे बचते थे उसका उपयोग वे पुस्तकें खरीदने के लिए करते थे।पढ़ने में ये इतने तल्लीन हो जाया करते थे कि कई दफा इनका सामान सफर के दौरान चोरी हो जाता था और इन्हें बाद में इसका पता चलता था।किताबों को लेकर वे क्रेजी थे। इनके पास हमेशा एक पॉकेट डायरी रहती थी जिसका इस्तेमाल वे पढ़ी गयी पुस्तक का सारांश या निचोड़ लिखने के लिए करते थे। विदेशी विद्वान और शोधार्थी भी उनके संपर्क में रहते थे। एक दर्शनशास्त्र का जिज्ञासु जार्ज जेम्स तो अमेरिका से उनसे मिलने आया था और बहुत दिनों तक इनके नगराटोली स्थित आवास पर रहकर अध्ययन-मनन करने के बाद लौटा था। शोद्यार्थियों को थीसिस लिखाने की क्षमता इनमें जबर्दस्त थी। इनकी वेशभूषा बड़ी साधारण थी। इनकी वेशभूषा को देखकर कोई अंदाजा नहीं लगा सकता था कि वे इतने दर्शनशास्त्र के इतने बड़े विद्वान हैं। हिन्दी, संस्कृत और अंग्रेजी भाषा पर इनका समान अधिकार था।दर्शनशास्त्र चाहे वह पाश्चात्य हो या फिर भारतीय इनकी नस-नस में समाया हुआ था।

रामानुजम फिलोसोफी ऑफ रीलिजन था शोध विषय

पिता पांडेय लक्ष्मी नारायण और माता सुभाषकली की सुयोग्य संतान डॉ पीबी विद्यार्थी ने पटना विश्वविद्यालय से संस्कृत में बीए की परीक्षा पास की। इसके बाद उन्होंने यहीं से दर्शनशास्त्र में एमए की परीक्षा वर्ष 1950 में प्रथम श्रेणी में गोल्ड मेडल लेकर पास की। वर्ष 1966 में इन्होंने पटना विश्वविद्यालय से पी.एचडी की परीक्षा पास की। पी.एचडी के लिए इनके शोध का विषय रामानुजम फिलोसोफी ऑफ रीलिजन था। डॉ विद्यार्थी ने इसके बाद मुजफ्फरपुर के लंगट सिंह कॉलेज में पढ़ाना शुरू किया। बाद में वे रांची विश्वविद्यालय में पदस्थापित हो गये। रांची विश्वविद्यालय के दर्शनशास्त्र विभाग के प्रोफेसर और विभागाध्यक्ष के तौर पर इन्होंने कई रिसर्च प्रोजेक्ट में मेंटर की भूमिका निभायी। भारतीय और पाश्चात्य दर्शनशास्त्र में इन्होंने कई पेपर पब्लिश किए। अपनी विद्वता के कारण विभाग के विद्यार्थियों और शोधार्थियों के साथ शिक्षकों और कर्मचारियों का भी इन्हें स्नेह हासिल हुआ।
लेखक हजारीबाग के शेख भिखारी मेडिकल कॉलेज में पैथोलॉजी के प्रोफेसर हैं और पूर्व में जमशेदपुर के महात्मा गांधी मेडिकल कॉलेज में पैथोलॉजी डिपार्टमेंट के एचओड़ी रह चुके हैं।

Share This Article
Leave a comment