जांच के नाम पर ठहराव, जवाबदेही पर उठे सवाल
प्रदेश में सामने आए करीब 1500 करोड़ रुपये के कथित वित्तीय अनियमितता मामले ने एक बार फिर प्रशासनिक कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े कर दिए हैं। मामले की गंभीरता को देखते हुए मुख्यमंत्री स्तर से जांच को लेकर स्पष्ट समयसीमा तय की गई थी, लेकिन वह लक्ष्य कागजों तक ही सीमित रह गया। हैरानी की बात यह है कि जांच के लिए गठित समिति अब तक एक भी औपचारिक बैठक नहीं कर सकी है।
इस देरी ने न सिर्फ विपक्ष को सरकार पर हमला करने का मौका दिया है, बल्कि आम जनता के बीच भी यह धारणा बनने लगी है कि इतने बड़े मामले में ठोस कार्रवाई से बचा जा रहा है। सरकार की ओर से पहले संकेत दिए गए थे कि तय अवधि में जांच की दिशा और शुरुआती निष्कर्ष सामने लाए जाएंगे, लेकिन जमीनी हकीकत इसके उलट नजर आ रही है।
सूत्रों के मुताबिक, जांच प्रक्रिया में रुकावट की तीन प्रमुख वजहें सामने आ रही हैं। पहली, समिति के सदस्यों के बीच समन्वय की कमी बताई जा रही है, जिससे बैठक की तारीख तक तय नहीं हो पा रही। दूसरी, जरूरी दस्तावेज़ और रिकॉर्ड समय पर उपलब्ध न होने का तर्क दिया जा रहा है, जिससे जांच शुरू करने में तकनीकी अड़चनें आ रही हैं। तीसरी वजह प्रशासनिक प्राथमिकताओं का बदलना माना जा रहा है, जहां अन्य मुद्दों के चलते इस मामले को अपेक्षित तवज्जो नहीं मिल पाई।
इस बीच, विपक्षी दल लगातार सवाल उठा रहे हैं कि जब खुद सरकार ने समयसीमा तय की थी, तो उसका पालन क्यों नहीं हुआ। उनका आरोप है कि देरी जानबूझकर की जा रही है, ताकि मामला ठंडे बस्ते में चला जाए। वहीं सरकार की ओर से कहा जा रहा है कि जांच पूरी पारदर्शिता और नियमों के तहत होगी, भले ही इसमें समय क्यों न लगे।
जानकारों का मानना है कि यदि जल्द ही समिति की बैठक नहीं होती और जांच प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ती, तो यह मामला राजनीतिक और प्रशासनिक दोनों स्तरों पर सरकार के लिए मुश्किलें खड़ी कर सकता है। फिलहाल निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि आगे कब ठोस कदम उठाए जाते हैं और क्या जिम्मेदारी तय हो पाती है या नहीं।
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