नदी संसाधनों के इस्तेमाल को लेकर नया विवाद, पड़ोसी राज्यों पर बढ़ेगा आर्थिक दबाव
जल सेस को लेकर कानूनी अड़चनें आने के बाद हिमाचल प्रदेश सरकार ने राजस्व बढ़ाने के लिए नई राह अपनाई है। अब राज्य सरकार ने जलविद्युत परियोजनाओं पर ‘भूमि मालिया सेस’ लागू करने का फैसला किया है। यह शुल्क उन परियोजनाओं पर लगेगा, जो राज्य की जमीन और प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग कर बिजली उत्पादन कर रही हैं। सरकार का तर्क है कि पहाड़ी क्षेत्रों में पर्यावरणीय और सामाजिक लागत को देखते हुए यह कदम जरूरी है।
इस फैसले का सीधा असर पड़ोसी राज्यों पर पड़ने की संभावना है। खास तौर पर पंजाब को इससे सालाना करीब 200 करोड़ रुपये का अतिरिक्त बोझ झेलना पड़ सकता है, क्योंकि उसकी बिजली जरूरतों का एक बड़ा हिस्सा हिमाचल की जलविद्युत परियोजनाओं से पूरा होता है। विशेषज्ञों का कहना है कि इस सेस का भार अंततः बिजली की दरों पर भी पड़ सकता है।
हिमाचल सरकार का कहना है कि राज्य की भौगोलिक परिस्थितियां कठिन हैं और बांधों, सुरंगों व परियोजनाओं के कारण स्थानीय लोगों को कई तरह की समस्याओं का सामना करना पड़ता है। भूमि अधिग्रहण, पर्यावरणीय नुकसान और बुनियादी ढांचे पर दबाव जैसी चुनौतियों के लिए मुआवजा जरूरी है। इसी को ध्यान में रखते हुए भूमि मालिया सेस को एक वैकल्पिक राजस्व स्रोत के रूप में देखा जा रहा है।
वहीं, पंजाब में इस फैसले को लेकर चिंता बढ़ गई है। राज्य के ऊर्जा विशेषज्ञों और नीति निर्माताओं का मानना है कि अगर अतिरिक्त लागत बिजली खरीद समझौतों में जोड़ी जाती है, तो इसका असर उपभोक्ताओं पर पड़ेगा। कुछ राजनीतिक दलों ने इसे राज्यों के बीच टकराव बढ़ाने वाला कदम बताया है।
कानूनी जानकारों के अनुसार, यह मुद्दा भी भविष्य में न्यायिक जांच के दायरे में आ सकता है, क्योंकि अंतरराज्यीय नदियों और परियोजनाओं से जुड़े मामलों में संवैधानिक पहलू अहम होते हैं। फिलहाल, हिमाचल सरकार अपने फैसले पर अडिग नजर आ रही है और इसे राज्य हित में जरूरी कदम बता रही है।
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