समूचे भारत को एकता के सूत्र में बांधनेवाली कड़ी है हिन्दी : डॉ चक्रधर त्रिपाठी

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डॉ चक्रधर त्रिपाठी

भारत जननी एक हृदय हो,

एक राष्ट्रभाषा हिंदी में,

कोटि-कोटि जनता की जय हो,

भारत जननी एक हृदय हो।

स्नेह सिक्त मानस की वाणी,

गूंजे गिरि यही कल्याणी.

चिर उदार भारत की संस्कृति,

सदा अभय हो,सदा अजय हो,

भारत जननी एक हृदय हो।

 पंडित रामेश्वर दयाल दूबे ने अपनी कविता की इन पंक्तियों में जिस भाषा की जय और भारत जननी के एक हृदय होने की बात कही है, वह भारत की भारती हमारी राष्ट्र भाषा हिन्दी है।भारत जैसे बहुभाषा-भाषी देश में सांस्कृतिक और वैचारिक विभिन्नताओं के बीच अनेकता में एकता को मूर्त करनेवाली शक्ति के रूप में हिन्दी की भूमिका विशिष्ट रही है।विभिन्न जातियों, संप्रदायों और भाषा परिवारों के लोग इस देश में सांस्कृतिक स्तर पर एकीकृत हैं और सब मिलकर भारत राष्ट्र की कल्पना को साकार करते हैं।भारत में विभिन्न स्रोतों से आए सांस्कृतिक सूत्र इसी कारण बिखराव ग्रस्त नहीं हो सके कि इस बहुभाषी राष्ट्र को, समूचे देश की जनता को सामासिक और सांस्कृतिक एकता के सूत्र में बांधने वाली कड़ी के रूप में हिंदी विद्यमान है।महाकवि डा उमा शंकर चतुर्वेदी ‘कंचन’ ने अपने ‘हिंदी’ खंड काव्य में इसी एकता की ओर संकेत करते हुए लिखा है कि-

संस्कृति को इक हार के रूप में,

जोड़ सके वो कड़ी है ये हिंदी।

लेके सहारा चले अन्हरा उस

अंधे के हाथ छड़ी है ये हिंदी।

जीवन दान मिले जिससे,

विष मार सके वो जड़ी है ये हिंदी।

प्यार से भारत माता कहें,

कि सुनो हमसे भी बड़ी है ये हिंदी।

 कन्या कुमारी में अरब सागर और बंगाल की खाड़ी की जो एकता है, प्रयाग राज इलाहाबाद में जो गंगा, यमुना और सरस्वती का जो संगम है,उसी के समानांतर हिंदी में इस विशाल देश की सांस्कृतिक परंपराओं, वैचारिक दिशाओं, भाषिक विविधताओं और भावात्मक परिकल्पनाओं को एकीकृत करने की विलक्षण सामासिकता है।हिंदी भाषा का इतिहास इस बात का साक्षी है कि उसने अनगिनत चिंतन धाराओं को अभिव्यक्ति दी है,सभी संप्रदायों को वाणी दी है और विभिन्न भाषाओं की जातीय विशेषताओं के बीच अपनी विराट् सामासिक शक्ति का परिचय दिया है।यह सामासिकता किसी भी जीवंत भाषा की पहली पहचान होती है।इसी सामासिकता के कारण आज हिन्दी विश्व मंच पर प्रतिष्ठित है।भारत के कोने कोने में और भारत के मानचित्र से बाहर मारीशस, सूरीनाम, फीजी, गुआना, ट्रीनीडाड,नेपाल, म्यांमार आदि देशों में हिंदी बोलने समझने और लिखने वाले लोग उपलब्ध हैं। इन सबने मिलकर हिंदी की साहित्य-संपदा का विस्तार किया है, लेकिन इसका केंद्रीय कारण यही है कि हिंदी में अद्भुत सामासिक क्षमता है।

 आप कन्याकुमारी के समुद्र तट पर खड़े हों तो एक विचित्र दृश्य नजर आएगा। हिंद महासागर की जलराशि, अरब सागर और बंगाल की खाड़ी के पानी को अपने में समेटती दिखाई देगी।दूर दूर से आने वाली विभिन्न अंतर्धाराएं जिस तरह महासमुद्र में पहुंच कर एक हो जाती हैं, उसी तरह भारत जैसे विशाल देश में फैली विभिन्न सांस्कृतिक प्रवृत्तियों को हिंदी ने एकसूत्र में आबद्ध किया है।’संस्कृति के चार अध्याय’ में राष्ट्र कवि दिनकर ने  भारत की जिस सामासिक संस्कृति की चर्चा की है,उसका निखरा हुआ रूप हिंदी में लक्षित होता है। प्राचीन आर्य भाषाओं की परंपरा से लेकर नई भारतीय भाषाओं तक की सारी उपलब्धियों को समेटने का कार्य हिंदी ने किया है। सारे संसार से आगत ,भाषाओं और संस्कृतियों की श्रेष्ठ उपलब्धियों से भारतीय मूल के लोग जहां कहीं भी गए हैं,वहां की परंपराओं का समाहार करनेवाली यह भाषा समन्वय का आदर्श उदाहरण है।वास्तव में हिंदी की प्रकृति सामासिक समन्वय के लिए निरंतर अनुकूल रही है और इसी कारण वह किसी सीमित क्षेत्र में बोली जाने वाली भाषा नहीं रह गई है।वह इस विशाल देश के किसी राज्य, जाति या संप्रदाय विशेष की भाषा न होकर संपूर्ण भारतवर्ष की भाषा है,सबकी भाषा है;इसीलिए कहा जाता है कि-

कोटि-कोटि कंठों की भाषा,

जन-मन की मुखरित अभिलाषा।

हिंदी है पहचान हमारी,

हिंदी हम सबकी अभिलाषा।

अनेकता के बीच एकता के साम्राज्य को स्थापित करने में अपना महत्वपूर्ण योगदान देनेवाली यह भाषा स्वाधीनता आंदोलन के दिनों से लेकर आज तक इस देश के विभिन्न भाषा भाषियों के बीच एक सशक्त कड़ी है।यह किसी एक धर्म द्वारा स्वीकृत भाषा नहीं है,बल्कि इसने सभी प्रचलित धर्मों को वाणी दी है।दर्शन और विचार धारा की किसी एक लीक पर चलना भी हिन्दी का स्वभाव नहीं है,बल्कि उसने मनुष्य की सुदीर्घ चिंतन परंपरा की सारी विचार दिशाओं को अपने भीतर समेटा है।समन्वय की इस गंगा में न जाने कितनी देशी-विदेशी भाषाओं की शब्द संपदा का समाहार हुआ है।पिछली अनेक शताब्दियों में विभिन्न संप्रदायों और देशों के भाषा साहित्य के संपर्क से हिंदी ने इतना अधिक ग्रहण किया है कि अब उन शब्दों के मूल स्रोतों को खोजना भी कठिन है।किसी को विश्वास भी नही होगा कि अंचार मूलतः पुर्तगीज शब्द है और रिक्शा चीनी भाषा से आया है।फ्रेंच से रेस्तरां, तुर्की से बीबी,फारसी से तमाशा अरबी से कचहरीऔर डच से बम जैसे प्रचलित शब्दों को हिंदी ने सहर्ष अपनाया है।अंग्रेजी, अरबी और फारसी से आए शब्दों की सूची तो बहुत लंबी है,जिन्हें हिन्दी ने सहर्ष स्वीकार किया है।भारतीय भाषाओं के विभिन्न शब्दों को भी हिंदी ने उदारता पूर्वक स्वीकार किया है।बंगला से संदेश, पंजाबी से मंगेतर, मराठी से चालू,गुजराती से हड़ताल, तेलगु से झंडा और तमिल से कूप्पी जैसे अनगिनत शब्दों का स्वागत हिंदी ने किया है।हिंदी की इस समन्वयात्मक प्रकृति के संदर्भ में ही भारतीय संविधान के अनुच्छेद 351 में स्पष्ट निर्देश किया गया है कि:-“केन्द्र सरकार का यह कर्तव्य होगा कि वह हिंदी भाषा के विकास को इस प्रकार उन्नत बनाए कि वह भारत की मिश्रित संस्कृति के समस्त तत्वों की अभिव्यक्ति के माध्यम के रूप में उपयोग में लाए जाने के लिए विकसित हो सके।” संविधान के इस निर्देश के अनुसार राजभाषा हिंदी के सामासिक रूप की चर्चा तो अब शुरु हुई है,जबकि हिन्दी शताब्दियों से अपने विराट् सामासिक सांस्कृतिक रूप का परिजय दे रही है, वस्तुतः सांस्कृतिक समन्वय और राष्ट्रीय एकता की कड़ी के रूप में हिंदी ने जो स्थान प्राप्त किया,उसका आधार न तो कोई राजदरबार था और न कोई संविधान सभा थी। जिनकी मातृभाषा हिंदी है और जिनकी मातृभाषा हिंदी नहीं है-उन सब लोगों ने सहज माध्यम के रूप में हिन्दी को स्वीकारा है।यहाँ तक की इस देश के तीर्थ-यात्रियों की भाषा हिंदी है।इस रूप में हिंदी न जाने कब से विभिन्न भाषा भाषियों के बीच व्यवहार में प्रचलित है। सैकडों वर्ष पहले मध्य काल के संतों और महात्माओं ने अपने विचारों को सारे देश में फैलाने के लिए हिन्दी माध्यम को अपनाया।इसके बाद हिंदी साधुओं और फकीरों की भाषा बनी।आजादी के बहुत पहले से कुछ देशी रियासतों में हिंदी को प्रशासन की भाषा बनने का सौभाग्य मिला था।स्वतंत्रता के बाद हिन्दी को संविधान निर्माताओं ने 14 सितंबर 1949 को राजभाषा का दर्जा दिया -यह हिंदी के लिए गौरव का संदर्भ है।इस नयी भूमिका ने हिंदी के प्रयोजन मूलक रूप को समूचे राष्ट्र के धरातल पर स्थापित किया है। हिन्दी की अन्यतम विशेषता उसकी उदारता, सहजता और सहिष्णुता है। बेहद खुले मत के साथ हिंदी ने उन सारी संस्कृतियों और व्यवहारों को अपनाया है, जो उसके संपर्क में आईं।देश के एक छोर से दूसरे छोर तक बसे लोगों को प्रेम और बंधुत्व की डोर से बांधने वाली भाषा हिन्दी ही है। अमीर खुसरो और तानसेन के समय से लेकर विष्णु दिगंबर पलुस्कर और बड़े गुलाम अली खां जैसे संगीतकारों ने प्रमाणित किया है कि हिंदी ही इस देश में राग,पाग और संगीत की समर्थ भाषा है।गीतकार मोहम्मद रफी,कुंदन लाल सहगल,लता मंगेशकर और किशोर कुमार के गाए हिंदी गीतों ने पंजाबी, मराठी और बंगाली की पहचान भुलाकर इन्हें भारतीय भाषा हिन्दी का गायक सिद्ध किया है। हिंदी साहित्य के संपूर्ण इतिहास में अनगिनत ऐसे लोगों का अवदान है,जो मूलतः हिंदी भाषी नहीं थे।भक्ति और चिंतन,प्रेम और संगीत, संपर्क और व्यवहार के बहुत सारे आयामों को हिंदी ने स्वीकार किया है।नये तकनीकी संसाधनों, विज्ञान की उपलब्धियों औ अत्याधुनिक संचार माध्यमों ने एक बार फिर से हिंदी में छिपी भावनात्मक एकता को साकार किया है।हिंदी का द्वार सभी भाषाओं, सभी व्यवहारों और सभी अभिव्यक्तियों के लिए खुला है।केवल हिंदी में ही यह सामर्थ्य है कि वह इस देश की विभिन्न भाषाओं से छनकर आने वाली भारत की सामासिक संस्कृति को स्वस्थ स्वरूप दे सके। केवल हिंदी में ही यह क्षमता है कि वह विभिन्न सांस्कृतिक परिवेशों को समेटकर ईकार के रूप में भारत के सामासिक मानचित्र को तैयार कर सके।उसका संकल्प समन्वय की विराट् चेष्टा है।इस कारण युग के अनुरूप अभिव्यक्ति कौशल और परिवेश की आवश्यकताओं के साथ जुड़कर हिंदी ने निरंतर एकता और समन्वय की भावनाओं को प्रोत्साहित किया है। शताब्दियों से इस देश के लोग भावनात्मक एकता के जिस सूत्र में बंधे हुए हैं उस सामासिक संस्कृति की अभिव्यक्ति माध्यम के रूप में हिन्दी की क्षमता पर संदेह नहीं किया जा सकता है।हिंदी ने भारत की विभिन्न भाषाओं में संचित ज्ञान राशि को एकीकृत कर विभिन्न संस्कृतियों के बीच समन्वय स्थापित कर राष्ट्रीय एकता का विलक्षण प्रयास किया है।हिन्दी के पास वह राष्ट्र-दृष्टि है,जिससे भारत की एकता के तंतु जुड़ते हैं।हिंदी के बिना न तो भारत की सामासिक संस्कृति की पहचान हो सकती है और न इस विराट वैविध्यपूर्ण देश  में एकता के मंत्र का संचार हो सकता है।इसी विशिष्टता के कारण आज हिंदी भारत भर में फैले महामानव समुद्र के स्नेह का पात्र बनी है।

लेखक : सेंट्रल यूनिवर्सिटी कोरापुट ओडिशा के कुलपति हैं

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