वर्ष 1901 में 51505 मुंडा और 60888 उरांव आदिवासियों ने किया था धर्म परिवर्तन : दिलेश्वर मिस्त्री

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दिलेश्वर मिस्त्री

अंग्रेजी शासन काल में झारखंड ने कई क्षेत्रों में बहुत तरक्की की। इस दौरान  कला, संस्कृति और साहित्य की तरक्की के साथ सत्ता के लिए हुए संघर्षों की भी अपनी एक अलग कहानी है। अंग्रेजी शासनकाल में भवन निर्माण कला की बात करें तो इस दौरान भवन निर्माण कला में यूनानी रोमन और गोथिक शैली से चर्च तथा अन्य भवनों का निर्माण हुआ। इस दौरान विशालकाय भवनों के निर्माण कार्य से छोटानागपुर का मान-सम्मान बढ़ने लगा। अंग्रेजों के साथ-साथ छोटानागपुर के आदिवासी भाई-बहनों ने चर्च में प्रवेश किया। अंग्रेजों ने आदिवासी योद्धाओं की निर्मम हत्या करके यहां शासन किया और यहां के भोले-भाले लोगों को ईसाई धर्म का पाठ पढ़ाया। सन 1901 में छोटानागपुर में मुंडा और उरांव जाति के लोगों की जनसंख्या क्रमश: 381628 और 590627 थी जिसमें 51505 मुंडा और 60888 उरांव आदिवासियों ने अपना धर्म परिवर्तन किया। कभी भूमि सुधार के नाम पर तो कभी विदेशी उच्च शिक्षा के नाम आदिवासियों को छला गया।आदिवासी शोध के नाम पर झारखंड को अंग्रेजों ने मुंडा और उरांव कंट्री लिख कर खंडित किया।मेरा मत है कि अंग्रेज संस्कृति विध्वंसक संस्कृति है।साहित्य की चर्चा करते हुए एक बात याद आती है शेक्सपियर की लिखे नाटक का किसी अंग्रेज विद्वान ने मुंडा भाषा में अनुवाद नहीं किया न ही किसी अन्य भाषा में अनुवाद किया। उन्होंने साहित्य को अपने फायदे के लिए इस्तेमाल किया। हालांकि कई हिन्दी साहित्यकार अंग्रेजी भाषा में लिखी किताब को ही साहित्य मानते हैं।यहां के मूल आदिवासी योद्धाओं ने अंग्रेजी हुकूमत से स्वाभिमान के साथ लड़ाई की और संघर्ष के दिनों में पीठ नहीं दिखायी। हालांकि झारखंड के इतिहास में कुछ आदिवासियों ने जयचन्द का काम किया।जिसका भुक्तभोगी बाबा कार्तिक उरांव को बनना पड़ा। आदिवासी संस्कृति नदी की तरह पाट बदलती है। अंग्रेजी हुकूमत से लेकर 21वीं सदी में आदिवासी कला संस्कृति और साहित्य में काफी बदलाव आया है। हालांकि आदिवासी अपनी पारंपरिक संस्कृति का यथावत बचाव करने में सफल नहीं हो सके।अंग्रेजी हुकूमत के समय समाज में जो पारम्परिक व्यवस्था थी पाहन और पुजारियों की। गांव में गैर आदिवासी धर्म स्वीकार करने से यह पारम्परिक समाजिक व्यवस्था क्षीण होती गयी। आज जरूरत है कि आदिवासी कला-संस्कृति आयोग का गठन राज्य में हो। आदिवासियों के विकास के लिए जैसी योजनाएं बनाये जाने की जरूरत है वैसी योजनाएं बन नहीं रही हैं।ऐसे में आदिवासी कला-संस्कृति नदी की तरह पाट बदल रही है।

लेखक : झारखंड के प्रख्यात कलाकार है

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