बिहार की राजनीति में अभी हावी है शराब

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महेश कुमार सिन्हापटना : बिहार की राजनीति फिलहाल शराब को लेकर गरमायी हुई है। सड़क से सदन तक राज्य में जहरीली शराब से हुई मौतों का मुद्दा छाया हुआ है। विपक्षी भाजपा ने इसे लेकर महागठबंधन सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। विपक्ष सरकार से मृतकों के आश्रितों को मुआवजा देने की मांग कर रहा है। जबकि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार बार-बार एक ही रट लगाये हुये हैं कि जो घटिया शराब पियेगा वो मरेगा। उनका कहना है कि यहां पूर्ण शराबबंदी लागू है,ऐसे में घटिया शराब पी कर मरने के मामले में मुआवजा कैसा? यह नहीं हो सकता है। इसके बाद सीएम नीतीश कुमार के व्यवहार से नाराज भजपा विधायकों ने राजभवन मार्च किया। विधायकों ने राज्यपाल से मुलाकात कर राज्य की चरमरायी कानून-व्यवस्था और शराबबंदी की विफलता के मद्देनजर नीतीश सरकार को बर्खास्त कर राष्ट्रपति शासन लगाने तक की मांग कर दी है। इस बीच छपरा में जहरीली शराब का कहर थमने का नाम नहीं ले रहा है और मौत का सिलसिला लगातार बढ़ता ही जा रहा है। कई इलाके जहरीली शराब के कारण शमशान में तब्दील हो गये हैं। स्थानीय लोगों के मुताबिक जहरीली शराब से 150 से ज्यादा लोगों की मौत हो गई है। गैर सरकारी आंकड़ों में 80 से ज्यादा लोगों की मौत की बात सामने आ गई है। जबकि मरने वालों का सरकारी आंकड़ा अभी केवल 34 ही है। इसके अलावा सीवान में अभीतक पांच  और बेगूसराय में दो लोगों की मौत भी जहरीली शराब से हो चुकी  है। इसके अलावा अभी 30 लोग अस्पताल में भर्ती हैं, जिसमें 12 की स्थिति बहुत गंभीर है। जहरीली शराब के कारण मारे गये सारे लोग गरीब, पिछड़े और दलित समाज के हैं। इस तरह पिछले चार दिनों में राज्य के तीन जिलों मे जहरीली शराब पीकर मरने वालों की कुल संख्या 87 हो गई है। आशंका जताई जा रही है कि मरने वालों की संख्या और बढ़ सकती है। छपरा शराब कांड को लेकर सियासत भी तेज है। विपक्ष सरकार पर लगातार हमलावर है। इस घटना ने बिहार समेत पूरे देश को इस पर सोचने को मजबूर कर दिया है। आरोप-प्रत्यारोप के बीच लोगों की मौत का आंकड़ा बढ़ता ही जा रहा है। गौरतलब है कि अप्रैल 2016 में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की सरकार ने बिहार में शराब बेचने और पीने पर प्रतिबंध लगा दिया था। ऐसे में यह बात छनकर सामने आई है कि शराब के धंधेबाज शाम पांच बजे के बाद ही सक्रिय हो जाते हैं। इस इलाके में कोड वर्ड ’10 रुपया में निमकी और 50 रुपया में चिमकी’ के साथ तीन से चार मिनट में ही शराब की ग्लास दे दी जाती है। वहीं कई बार 20 से 30 रुपये का ग्लास भी दिया जाता है। कहा जा रहा है कि करीब 10 साल पहले गली-मुहल्लों, दियारा इलाकों में दो रुपया निमकी, पांच रुपया चिमकी के कोड वर्ड के साथ देशी शराब बेची जाती थी। आज उसी कोड वर्ड को शराबबंदी के बाद धंधेबाज इस्तेमाल कर रहे हैं। वहीं रोजाना शराब पीने वाले भली-भांति इस कोडवर्ड से परिचित होते हैं। वहीं, जरूरत के हिसाब से शराब के धंधेबाज बिक्री का अड्डा भी बदलते रहते हैं।

महेश कुमार सिन्हा

पटना : बिहार की राजनीति फिलहाल शराब को लेकर गरमायी हुई है। सड़क से सदन तक राज्य में जहरीली शराब से हुई मौतों का मुद्दा छाया हुआ है। विपक्षी भाजपा ने इसे लेकर महागठबंधन सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। विपक्ष सरकार से मृतकों के आश्रितों को मुआवजा देने की मांग कर रहा है। जबकि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार बार-बार एक ही रट लगाये हुये हैं कि जो घटिया शराब पियेगा वो मरेगा। उनका कहना है कि यहां पूर्ण शराबबंदी लागू है,ऐसे में घटिया शराब पी कर मरने के मामले में मुआवजा कैसा? यह नहीं हो सकता है। इसके बाद सीएम नीतीश कुमार के व्यवहार से नाराज भजपा विधायकों ने राजभवन मार्च किया। विधायकों ने राज्यपाल से मुलाकात कर राज्य की चरमरायी कानून-व्यवस्था और शराबबंदी की विफलता के मद्देनजर नीतीश सरकार को बर्खास्त कर राष्ट्रपति शासन लगाने तक की मांग कर दी है। इस बीच छपरा में जहरीली शराब का कहर थमने का नाम नहीं ले रहा है और मौत का सिलसिला लगातार बढ़ता ही जा रहा है। कई इलाके जहरीली शराब के कारण शमशान में तब्दील हो गये हैं। स्थानीय लोगों के मुताबिक जहरीली शराब से 150 से ज्यादा लोगों की मौत हो गई है। गैर सरकारी आंकड़ों में 80 से ज्यादा लोगों की मौत की बात सामने आ गई है। जबकि मरने वालों का सरकारी आंकड़ा अभी केवल 34 ही है। इसके अलावा सीवान में अभीतक पांच  और बेगूसराय में दो लोगों की मौत भी जहरीली शराब से हो चुकी  है। इसके अलावा अभी 30 लोग अस्पताल में भर्ती हैं, जिसमें 12 की स्थिति बहुत गंभीर है। जहरीली शराब के कारण मारे गये सारे लोग गरीब, पिछड़े और दलित समाज के हैं। इस तरह पिछले चार दिनों में राज्य के तीन जिलों मे जहरीली शराब पीकर मरने वालों की कुल संख्या 87 हो गई है। आशंका जताई जा रही है कि मरने वालों की संख्या और बढ़ सकती है। छपरा शराब कांड को लेकर सियासत भी तेज है। विपक्ष सरकार पर लगातार हमलावर है। इस घटना ने बिहार समेत पूरे देश को इस पर सोचने को मजबूर कर दिया है। आरोप-प्रत्यारोप के बीच लोगों की मौत का आंकड़ा बढ़ता ही जा रहा है। गौरतलब है कि अप्रैल 2016 में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की सरकार ने बिहार में शराब बेचने और पीने पर प्रतिबंध लगा दिया था। ऐसे में यह बात छनकर सामने आई है कि शराब के धंधेबाज शाम पांच बजे के बाद ही सक्रिय हो जाते हैं। इस इलाके में कोड वर्ड ’10 रुपया में निमकी और 50 रुपया में चिमकी’ के साथ तीन से चार मिनट में ही शराब की ग्लास दे दी जाती है। वहीं कई बार 20 से 30 रुपये का ग्लास भी दिया जाता है। कहा जा रहा है कि करीब 10 साल पहले गली-मुहल्लों, दियारा इलाकों में दो रुपया निमकी, पांच रुपया चिमकी के कोड वर्ड के साथ देशी शराब बेची जाती थी। आज उसी कोड वर्ड को शराबबंदी के बाद धंधेबाज इस्तेमाल कर रहे हैं। वहीं रोजाना शराब पीने वाले भली-भांति इस कोडवर्ड से परिचित होते हैं। वहीं, जरूरत के हिसाब से शराब के धंधेबाज बिक्री का अड्डा भी बदलते रहते हैं।

लेखक : न्यूजवाणी के बिहार के प्रधान संपादक हैं और यूएनआई के ब्यूरो चीफ रह चुके हैं

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