आसमान में दुर्लभ खगोलीय संगम — Kurukshetra के आसपास आयोजन प्रभावित होगा
इस वर्ष का पारंपरिक रंगोत्सव अनूठे खगोलीय संयोग से टकरा गया है: पर्व का अगला दिन चंद्र का आंशिक/पूर्ण आवरण देखने को मिलेगा, जिससे धार्मिक प्रथाओं और लोकरिवाजों पर असर पड़ा है। विशेषज्ञों का कहना है कि मुख्य खगोलीय घटना तीन मार्च 2026 को शाम के समय घटेगी और देश के बहुत से हिस्सों में दिखाई देगी — इसलिए स्थानीय पूजा-परम्पराओं में संशय और बहस देखने को मिल रही है।
परंपरागत मान्यताओं के अनुसार ग्रहण से पहले ‘अशुभ काल’ की शुरुआत हुई मानी जाती है — यह प्रभाव आमतौर पर ग्रहण से करीब नौ घंटे पहले से माना जाता है, जिससे मंदिर-कार्य, तिलक, और कुछ प्रकार के संस्कार रोके जा रहे हैं। विभिन्न पंचांग-घोषणाओं में सूचक समय और आरंभ के विवरण थोड़े अलग दिए गए हैं; कुछ स्रोतों के अनुसार यह काल सुबह के कुछ घंटों में शुरू हुआ और शाम तक चलेगा। इसलिए पूजा-समय और अग्नि संस्कार के लिए अनेक स्थानों पर तारीख़ और मुहूर्त पर अलग-अलग राय बनी हुई है।
स्थानीय पंडित और ज्योतिष विभिन्न कारणों से होलिका-सम्बन्धी आग संस्कार के लिये दो विकल्प सुझा रहे हैं — कुछ का कहना है कि अग्नि आज शाम को जलाई जानी चाहिए, जबकि अन्य ग्रहण और ‘भद्रा’ के कारण अग्नि अस्थायी रूप से टालने की सलाह दे रहे हैं। इसी वजह से रंगों का उत्सव कई जगह 4 मार्च को मनाने की सलाह भी दी जा रही है।
समाप्ति: यह दुर्लभ संगम धार्मिक और खगोलीय दोनों दृष्टियों से चर्चा का विषय है — समुदायों को स्थानीय पंचांग और अभिभावकों/पंडितों की सलाह के अनुरूप सुरक्षित और परम्परागत रूप से तय निर्णय लेने की सलाह दी जा रही है।
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