निराले व्यक्तित्व के मालिक थे महाप्राण निराला : डॉ जंगबहादुर पांडेय

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डॉ जंगबहादुर पांडेय

हिन्दी साहित्य में सूर्यकुमार त्रिपाठी निराला जैसे व्यक्तित्व के साहित्यकार बहुत विरल हुए हैं। जिंदगी के झंझावतों का सामना करते हुए निराला ने जो रचा उसके लिए समस्त हिन्दी साहित्य सदैव उनका ऋणी रहेगा। दुख ही जीवन की कथा रही का उद्घोष करनेवाले निराला को दुखों ने ही मांजा और परिष्कृत किया और उनके साहित्य को नयी दिशा दी। निराला इसे बखूबी समझते थे, इसलिए उन्होंने कहा कि

दुःख ही जीवन की कथा रही,

क्या कहूं आज, जो नहीं कही!

हो इसी कर्म पर वज्रपात,

यदि धर्म रहे नत सदा माथ।

तो निराला के जीवन की कथा दुःखपूर्ण थी।हिन्दी के इस मूर्धन्य रचनाकार की वास्तविक जन्मतिथि के विषय में प्रामाणिक साक्ष्यों का अभाव है। निराला का जन्म कब हुआ? वसन्त पंचमी (माघ शुक्ल पंचमी) को ? या माघ शुक्ल एकादशी को? किस वर्ष हुआ?1896?,1897?या 1899?। निराला ने स्वयं ही दो स्थानों पर अपनी भिन्न-भिन्न जन्मतिथियों का उल्लेख किया है! निराला साहित्य के मर्मज्ञ प्रसिद्ध आलोचक रामविलास शर्मा ने उनकी जन्मतिथि 29 फरवरी 1899 ईस्वी लिखी है। क्या 1899 ईस्वी में फरवरी मास में 29 तारीख थी? अस्तु, हमें कोई न कोई जन्मतिथि तो स्वीकार करनी ही पड़ेगी। तो क्यों न बहुमत का ही सहारा लें!। बहुमान्य जन्मतिथि है 21 फरवरी 1899 ईस्वी। उनका जन्म बंगाल के मेदिनीपुर जिले के महिषादल में हुआ था। जबकि पैतृक गांव यूपी के उन्नाव का गढ़ाकोला था। पिता पंडित रामसहाय तेवारी के पुत्र के रूप में जन्मे निराला को पिता द्वारा नाम मिला- सुर्जकुमार तेवारी!। और अब प्रारम्भ में उद्धृत काव्य पंक्तियों की बात। अर्थात ‘दुःख ही जीवन की कथा रही’- ढाई वर्ष की उम्र में मातृ स्नेह से वंचित हुये और निष्ठुर तथा कठोर अनुशासनप्रिय पिता के साथ रहना पड़ा। मातृहीन बालक की छोटी से छोटी गलती की भी पिता कठोर सजा देते। निराला का आठ वर्ष की उम्र में स्कूल में प्रवेश हुआ। वहीं, 11 वर्ष की उम्र में उनके जीवन का सुखद क्षण आया जब मनोहरा देवी के साथ उनका विवाह हुआ। उनके जीवन के कुछ वर्ष उल्लासपूर्ण रहे। पुत्ररत्न की प्राप्ति हुई। पुत्र का नाम रखा रामकृष्ण। कालान्तर में एक प्यारी बिटिया भी हुई जिसका नाम सरोज रखा गया। और फिर- ‘दुःख ही जीवन…’पिता के निधन ने सुर्जकुमार को अचानक ही कठोर जीवन से साक्षात्कार करा दिया।अभी संभलने की कोशिश कर ही रहे थे कि एक दिन तार मिला- ‘पत्नी बीमार है, जल्दी आओ।’शीघ्र ही ससुराल डलमऊ पहुंचे। किन्तु पत्नी की चिता जल चुकी थी। जिसने जीवन में मिठास घोली, वही चिर वियोग विष पिला गयी।चार साल के रामकृष्ण और सवा साल की सरोज को ननिहाल में छोड़कर गांव आये तो हैजे की चपेट में सारा कुटुंब ही स्वाहा हो चुका था। हताश और निराश सुर्जकुमार महिषादल आ गये। वहां उनका संपर्क रामकृष्ण मिशन के संन्यासियों से हुआ और चित्त को कुछ विश्रान्ति मिली।गांधीजी के असहयोग आंदोलन से प्रभावित होकर कई राष्ट्रीय गीत लिखे। यह उनके काव्य जीवन का प्रारंभ था। नये जीवन के लिए नया नाम भी तो चाहिए! ‘सूर्जकुमार तेवारी’ नाम में कोई साहित्यिकता न थी। उन्होंने अपना नया नामकरण किया- ‘सूर्यकान्त त्रिपाठी’।वे मुक्त छंद में कविताएं लिखते और सभी अस्वीकृत होकर पत्रिकाओं के संपादकों के पास से लौट आतीं-

तब भी मैं इसी तरह समस्त

कवि-जीवन में भी व्यर्थ व्यस्त

लिखता अबाध गति मुक्त छन्द,

पर संपादकगण निरानन्द

वापस कर देते पढ़ सत्वर

दे एक-पंक्ति-दो में उत्तर।

बाद में वे रामकृष्ण मिशन के पत्र ‘समन्वय’ से जुड़े। रामकृष्ण परमहंस से सम्बद्ध साहित्य तथा स्वामी विवेकानन्द की अनेक कृतियों का हिंदी अनुवाद किया। कलकत्ता के धनी और साहित्यिक अभिरुचि वाले सेठ महादेव प्रसाद से परिचय हुआ। दोनों के प्रयास से रक्षाबंधन, रविवार, 1923 ई0 को साहित्य जगत में नया पत्र निकला- मतवाला। और मतवाला के तर्ज पर सूर्यकान्त त्रिपाठी का नया नामकरण हुआ- ‘निराला’। पत्र का मोटो था-

‘अमिय गरल शशि सीकर रविकर

राग विराग भरा प्याला।

पीते हैं जो साधक उनका

प्यारा है यह मतवाला।’

निराला का कवित्व और सम्पादन दोनों चमक उठे। उनकी कई कृतियां प्रकाशित और लोकप्रिय हुईं- अनामिका, परिमल और गीतिका। उन्होंने पुत्री सरोज का विवाह किया एक निर्धन किन्तु गुणी युवक शिवशेखर द्विवेदी के साथ। निराला बहुत प्रसन्न थे मानो जीवन की सबसे बड़ी निधि मिल गयी हो। किन्तु फिर वही- ‘दुःख ही जीवन की कथा…’ उन्नीस वर्ष की आयु में 1935 में सरोज का असमय निधन हो गया। पत्नी मनोहरा देवी के निधन के बाद यह जीवन का सबसे बड़ा आघात था। वह भीतर से टूट गये। उसी वर्ष हिंदी का प्रथम प्रबंधात्मक कालजयी शोकगीत रचा- ‘सरोज स्मृति’।

धन्ये, मैं पिता निरर्थक था

कुछ भी तेरे हित कर न सका

मुझ भाग्यहीन की तू सम्बल

युग वर्ष बाद जब हुई विकल,

दुःख ही जीवन की कथा रही,

क्या कहूं आज, जो नहीं कही!

उनके जीवन में तनाव बढ़ता ही गया। अगले वर्ष उन्होंने एक और कालजयी प्रबन्ध कविता रची- ‘राम की शक्तिपूजा’।

है अमानिशा, उगलता गगन घन अंधकार;

खो रहा दिशा का ज्ञान; स्तब्ध है पवन-चार

‘अन्याय जिधर, हैं उधर शक्ति!’कहते छल-छल

हो गये नयन, कुछ बूंद पुनः ढलके दृगजल

धिक् जीवन को जो पाता ही आया विरोध

धिक् साधन जिसके लिए सदा ही किया शोध।

निराला के मन की व्यथा इन पंक्तियों से उजागर होती है। किन्तु निराला रुके नहीं, थके नहीं-

वह एक और मन रहा राम का जो न थका,

जो नहीं जानता दैन्य, नहीं जानता विनय

कर गया भेद वह मायावरण प्राप्त कर जय

और फिर जब निराला उठे तो जीवन तथा अध्यात्म से आजीवन संलग्न रहे। कहानी, उपन्यास, संस्मरण, पौराणिक कथा, निबन्ध, आलोचना और कविता में अपनी विशिष्ट पहचान बनाई। जीवन में अनुभव की व्यापकता ने निराला के साहित्य को नया आयाम दिया। उन्होंने खूब लिखा और लोगों ने उन्हें खूब पढ़ा। दीन-दुखी और श्रमिक वर्ग की चेतना को उन्होंने न केवल स्वर दिया अपितु अपनी गाढ़ी कमाई भी अर्पित की। वह विचारों से मार्क्सवादी नहीं अपितु कर्म से सच्चे मानवतावादी थे। कभी कोई ऐसा अभावग्रस्त व्यक्ति न रहा जिसकी निराला ने आर्थिक मदद न की हो। वह तथाकथित मार्क्सवादियों की तरह कविता और विचारों में मार्क्सवाद और वास्तविक जीवन में भोगवाद के कभी पोषक नहीं रहे। इसीलिए हिंदी जगत उन्हें ‘महाप्राण निराला’ कहकर अपने हृदय के उच्चतम आसन पर समासीन करता आया है और करता रहेगा।15 अक्टूबर 1961 ईस्वी को प्रयागराज में महाप्राण निराला के प्राण विश्वलीन हो गये।निराला का सम्पूर्ण साहित्य राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली से ‘निराला रचनावली’ शीर्षक से आठ खंडों में प्रसिद्ध आलोचक नंदकिशोर नवल के सम्पादन में प्रकाशित है। निराला की प्रामाणिक जीवनी प्रसिद्ध आलोचक रामविलास शर्मा द्वारा तीन खण्डों में रचित ‘निराला की साहित्य साधना’ के प्रथम खण्ड में है।

 

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