कुढ़नी उपचुनाव के नतीजे में छिपे हैं कई राजनीतिक संदेश

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महेश कुमार सिन्हा

पटना। चुनावी राजनीति में पहले उप चुनाव को कोई खास महत्व नहीं दिया जाता था। इससे न तो सरकार की सेहत पर असर पड़ता था और न ही कोई राजनीतिक संदेश जाता था। अक्सर सत्ताधारी दल के उम्मीदवारों की ही जीत उपचुनावों में हुआ करती थी। लेकिन धीरे-धीरे  परिस्थितियां  बदलती गयी और अब कुछ उपचुनाव भी काफी महत्वपूर्ण होने लगे हैं। बिहार का कुढ़नी विधानसभा उपचुनाव भी सत्तारुढ़ महागठबंधन, खास कर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और विपक्षी भाजपा के लिए काफी महत्वपूर्ण था। सच मायने  मे यह उपचुनाव जीतना भाजपा के लिये गजरात विधान सभा चुनाव से भी बड़ी जीत है। जबकि इसमें महागठबंधन की नहीं, बल्कि नीतीश कुमार की व्यक्तिगत हार हुई है। कुढ़नी उपचुनाव  के नतीजे में कई राजनीतिक संदेश छिपे हुए हैं। सीएम नीतीश कुमार को कुढ़नी के परिणाम से निकले संकेतों को समझना होगा। कुढ़नी  का नतीजा निश्चित रुप से बिहार की भावी राजनीति की दिशा तय करेगा। इसका असर बिहार में अगले लोकसभा और विधानसभा  चुनावों में भी देखने को मिल सकता है। इस उपचुनाव के परिणाम से यह जाहिर होता है कि कुढ़नी की जनता ने जदयू के महागठबंधन में शामिल होने के नीतीश कुमार के फैसले को नकार दिया। जदयू को भाजपा से अलग होने का नुकसान उठाना पड़ा। भाजपा ने 2015के विधान सभा चुनाव में भी जदयू के मनोज कुशवाहा  को  हराया था। इस उपचुनाव में  भी भाजपा के केदार प्रसाद गुप्ता ने ही जदयू के मनोज कुशवाहा को मात दी है।यह संयोग है कि इन दोनों चुनावों में जदयू भाजपा से नाता तोड़ कर राजद के साथ मिल कर लड़ी थी। खास बात यह भी है कि इस उपचुनाव  में भाजपा के केदार प्रसाद गुप्ता को 2020 के विधान सभा चुनाव के बनिस्पत इस उप चुनाव में कम वोट पड़े, पर फिर भी वह जीत गये। जबकि 2020 में वह राजद के अनिल सहनी से हार गये थे। इससे साफ जाहिर होता है कि महागठबंधन का जनाधार खिसका है। भाजपा को सवर्णों और दलितों का पूरा साथ मिला। मुकेश सहनी का दांव नहीं चला और निषाद वोटों में बिखराव हुआ। जबकि भाजपा का वोट बैंक पूरी तरह इंटैक्ट रहा। नतीजतन तीर निशाने पर नहीं लगा और कुढ़नी में कमल खिल गया।

लेखक : न्यूजवाणी के बिहार के प्रधान संपादक हैं और यूएनआई के ब्यूरो चीफ रह चुके हैं

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