हिंद महासागर का मोती है मॉरीशस : डॉ जंगबहादुर पांडेय

Desk Editor
Desk Editor 13 Min Read

डॉ जंग बहादुर पांडेय

भोजपुरी सम्मेलन में भाग लेने के बहाने मुझे मॉरीशस घूमने और देखने का अवसर मिला।जिस कारण वहां के संस्कृतियों को आत्मसात कर पाया। मॉरीशस जितना छोटा और प्यारा है उतना ही खूबसूरत है प्राचीन काल में यह टापू एक बड़ा जंगल था जिसमें किसी भी व्यक्ति का निवास नहीं था यहां अनेक सुंदर पक्षियों का बसेरा हुआ करता था इन सुंदर पक्षियों में एक का नाम था डोडो; इसलिए कभी मॉरीशस को डोडो का देश भी कहा जाता था। मॉरीशस मुंबई से 2910 मील पश्चिम दक्षिण तथा दक्षिण अफ्रीका के समुद्र तट से 1250 मील पूरब हिंद महासागर में प्रकाश ग्रह की तरह अवस्थित है। 39 मील लंबा और 29 मील चौड़ा 720 वर्ग मील क्षेत्रफल तथा लगभग 20 लाख आबादी वाला अद्वितीय देश है।यहां अफ्रीकी यूरोपीय और एशियाई संस्कृतियों का संगम है । यह हिंदू बौद्ध क्रिश्चियन और इस्लाम इन चार धर्मों का सम्मेलन है। यहां हिंदी, भोजपुरी, क्रेओल, तमिल, तेलुगू, मराठी, उर्दू, गुजराती, फ्रेंच, अंग्रेजी तथा चीनी जैसी भाषाएं सहोदर बहनों की तरह मेल जोल से रहती हैं। विभिन्न स्कूलों के लोग सजे हुए गुलदस्ते का रूप प्रदान करते हैं यहां की प्राकृतिक छटा निराली है। हर एक कोस पर प्रकृति नई वेशभूषा में उपस्थित होती है तथा हर 8 कोस पर मौसम बदल जाता है लगता है उस मॉरीशस को जैसे सौंदर्य प्रेमी युवक विधाता ने अपने हाथों से संवारा और बनाया है।चारों ओर मूंगों के पहाड़ों से घिरे रहने के कारण समुद्र के उतार विकराल लहरें कोई एक मील दूर ही टूट कर रह जाती है। यहां के समुद्र तट कोलाहल शून्य एवं निरापद हैं। प्रतीत होता है चांदी की तरह चमचम पारदर्शी जल में किसी चतुर रंग साज ने नीला या हरा रंग कुशलतापूर्वक मिश्रित कर दिया है। इस देश का नाम मॉरीशस हालैंड के राजकुमार मोहित के नाम पर पड़ा। मॉरिशस का अर्थ होता है राजकुमार मॉरिट्ज का देश।वास्तव में 19 सितंबर सन 1598 ई.डच नाविक वान वारविक अपने मित्रों के साथ जहाज से ग्रा-पोर में आए और इस द्वीप का नाम मॉरीशस रखा। मॉरीशस हिंद महासागर का मोती है। मॉरीशस महासागर के उंगली में पड़े दीपों की अंगूठी में हीरे का नग है। अमेरिका के प्रसिद्ध साहित्यकार मार्क टवेन ने कहा है कि God first of all made Mauritius & then he copied it for the heaven & univese अर्थात् परमात्मा ने पहले मॉरीशस का निर्माण किया और उसी के नमूने पर बाद में बैकुंठ और विश्व को बनाया। मॉरीशस में यह के किवदंती है कि मरते समय मारीच ने श्रीराम के सामने यह इच्छा प्रकट की थी कि वह सदा उनका नाम सुनता रहे। जब श्रीराम ने मारीच के शव का स्पर्श किया तो वह मोती के रूप में परिणत हो गया। श्री राम ने जब उस मोती को दक्षिण समुद्र में उठा कर फेंका तो मॉरिशस बन गया। हजारों-हजार साल तक मारीच की आत्मा मॉरीशस में राम नाम सुनने के लिए अकुलाती रही। परंतु मॉरीशस में भारतवंशियों के आगमन के बाद कलयुग में उसकी मनोकामना पूर्ण हुई। मॉरीशस सचमुच हिंद महासागर में लघु भारत है। अब रोज वहां के लोग मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान राम का नाम गोस्वामी तुलसीदास की रामचरितमानस के माध्यम से सुना करते हैं। राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर ने मॉरीशस को हिंद महासागर में छोटा हिंदुस्तान के संज्ञा प्रदान की है। मॉरीशस के कवि ने लिखा है कि उसके देश माता ने ईख की साड़ी पहनी है। मॉरीशस की धरती सुहानी  ही नहीं, वरन इसकी हर इंच धरती मिठास उगलती है। मॉरीशस की धरती मिठास, आकाश से मिठास हवा में मिठास लोगों के जुबान में मिठास व्यवहार में मिठास आतिथ्य में मिठास यानी मिठास के चेतन विग्रह का ही नाम है मॉरीशस। मॉरीशस की राजधानी पोर्ट लुई है, जो समुद्र तट पर है और अपनी खूबसूरती में अनुपम एवं अब द्वितीय है। पोर्टलुई की सुंदरता हर पर्यटक का मन मोह लेती है और वही बस जाने का मन हो जाता है। मॉरीशस की राजधानी पोर्ट लुई स्थित इंदिरा गांधी भारतीय सांस्कृतिक केंद्र में बीते 29 से 30 अगस्त 2009 तक चतुर्थ विश्व भोजपुरी सम्मेलन आयोजित हुआ, जिसे भारतीय प्रवासी केंद्र तथा मॉरीशस के मानव संसाधन एवं सांस्कृतिक मंत्रालय ने मिलकर आयोजित किया। 29 अगस्त को प्रातः 10:00 बजे मॉरीशस के राष्ट्रपति अनिरुद्ध जगन्नाथ ने विश्व भोजपुरी सम्मेलन का उद्घाटन भोजपुरी में किया। उन्होंने कहा कि मॉरीशस में इस समय भोजपुरी की ज्योति फैल रही है, भोजपुरी की वकालत करते हुए उन्होंने कहा कि भोजपुरी हमार माता तथा भोजपुरी हमनी के आत्मा ह।वहां के शिक्षा व संस्कृति मंत्री ने अपने अध्यक्षीय भाषण में कहा कि भोजपुरी शीघ्र ही मॉरीशस की राष्ट्रभाषा घोषित होगी विश्व भोजपुरी सम्मेलन के उपाध्यक्ष एवं मॉरीशस के पूर्व स्वास्थ्य मंत्री जगदीश गोवर्धन ने आगत अतिथियों का भव्य स्वागत किया ।उन्होंने कहा कि हमारा सौभाग्य है कि विश्व भर से आए भोजपुरी भाइयों की सेवा का अवसर हमें प्राप्त हो रहा है। विश्व भोजपुरी सम्मेलन के अध्यक्ष सतीश त्रिपाठी ने कहा कि भोजपुरी केवल भारत की भाषा नहीं अभी तो आज यह विश्व भाषा बन गई है।मॉरीशस जाने का आमंत्रण बीएन तिवारी भाई जी भोजपुरिया के सौजन्य से प्राप्त हुआ था।25 को ट्रेन से हमलोग मुंबई पहुंचे और 27 को प्रातः 3:15 में एयर मारीशस हवाई जहाज के द्वारा प्रातः 8:30 में मॉरीशस के शिवसागर रामगुलाम अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे पर उतरे। वहां हमारा भव्य स्वागत हुआ। सम्मेलन 2 दिन चला परंतु 4 दिन आयोजकों ने प्रतिभागियों के भ्रमण के लिए रखा था ।हमें क्यूपीप के लावेजी होटल में ठहराया गया था। होटल मालकिन ने अपने आतिथ्य से हमारा मन मोह लिया। वह बराबर हम अतिथियों का भरपूर ख्याल रखती थी। प्रतिदिन नए-नए स्थलों का भ्रमण हमें कराया जाता था। 1 दिन रामायण केंद्र दूसरे दिन शिवालय तीसरे दिन दुर्गा मंदिर चौथे दिन समुद्र तट के दर्शन कराए गए। 1 दिन वहां के महामहिम ने अपने राष्ट्रपति भवन में सभी प्रतिभागियों को चाय पर आमंत्रित किया पर सभी के साथ सामूहिक फोटोग्राफी करायी। महामहिम अनिरुद्ध जगन्नाथ इतनी आत्मीयता से मिले कि हमें अहसास ही नहीं हुआ कि वे वहां के राष्ट्रपति हैं।1 दिन वहां के प्रथम प्रधानमंत्री डॉ शिवसागर रामगुलाम के गांव के उच्च विद्यालय में सांस्कृतिक कार्यक्रम रखा गया कलाकारों ने अपने नृत्य और संगीत से हम दर्शकों का मन मोह लिया हमें भी गीत संगीत सुनाने का मौका मिला दर्शकों से वाहवाही भी मिली ।प्रातः काल का नाश्ता तो हम लावेजी होटल में करते थे परंतु दोपहर में और रात्रि का भोजन जिस स्थल को देखने जाते थे वही होते थे ।रामायण केंद्र में कवि गोष्ठी का आयोजन हुआ जिसकी अध्यक्षता डॉ बृजेंद्र त्रिपाठी ने की पर मुख्य अतिथि डॉ श्री राम दुबे थे। रामायण केंद्र के सचिव राजेंद्र अरुण जी ने आगत अतिथियों का भव्य स्वागत किया। हमने भी कविता सुनाई लोगों को गदगदाया और गुदगुदाया। वहां के लोग जबरदस्ती आत्मीयता से परिचय करते और अपने घर ले जाने का विनम्र अनुरोध भी ।नौबत सिंह एक ऐसे ही सज्जन मिले ,जिन्होंने अपनी पुस्तक  अधिकांश प्रतिभागियों को भेंट की और आने के दिन हमें पति पत्नी अपने घर ले गए और प्रेम से खिलाया पत्नी एवं बच्चों से परिचय कराया उन्हें यह जानकर अत्यधिक खुशी हुई कि हम बिहार के भोजपुर के रहने वाले हैं ।हिंदी विभाग के प्रोफेसर नागेश्वर सिंह की मौसी शकुंतला जी ने बड़े प्यार से हमें अपने घर बुलाया हमें ऐसा लगा कि हम अपने मौसी के घर आए हैं इतनी आत्मीयता प्रदर्शित की कि हम भूल गए कि भारत से बाहर मॉरीशस में हैं ।अतिथि देवो भाव: की वास्तविक अनुभूति वहां हमें हुई। भारतवर्ष में भव्य मेहमान गिरी के लिए जनकपुर प्रसिद्ध है कहा जाता है कि जनकपुर में मेहमानों का स्वागत अभूतपूर्व होता है। लेकिन मॉरीशस वासियों के स्वागत ने इसके किनदंती को झुठला दिया ।अपने 1 सप्ताह के प्रवास में हमें ऐसा लगा ही नहीं कि हम अपने देश से बाहर हैं। मॉरीशस के प्रत्येक नागरिक को निशुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा सरकार की ओर से प्राप्त है। जो माता-पिता अपने बच्चों को स्कूल या कॉलेज नहीं भेजते हैं,वे दंड के अधिकारी होते हैं। भला ऐसी व्यवस्था विश्व के कितने देशों में हैं! वहां प्रत्येक नागरिक को 60 वर्ष के बाद पेंशन के सरकारी व्यवस्था है। बिना किसी जातिगत भेदभाव के यह व्यवस्था सब के लिए है। वहां तिलक दहेज की प्रथा नहीं है वहां से इच्छा से वर एवं वधू पक्ष के लोग एक सादे समारोह में विवाह संपन्न कर लेते हैं। विवाह के लिए किसी पंडित या मुल्ले की विशेष आवश्यकता नहीं होती रामचरितमानस की 7 चौपाइयां या गीता के 7 श्लोक  वर-वधू को परिणय सूत्र में बांधने के लिए सात फेरे का काम कर देते हैं। मॉरीशस स्वच्छता का पर्याय लगा।सिपाही या पुलिस तो सड़क पर कहीं दिखे ही नहीं। सात दिनों में 1 मिनट के लिए भी बिजली गुल नहीं हुई। ऐसा सुंदर एवं अनुपम देश विश्व में दुर्लभ है वहां के राष्ट्रीय झंडे में चार रंग है लाल नीला पीला और हरा लाल स्वतंत्रता का, नीला हिंद महासागर का, पीला रंग नए प्रभात का और हरा रंग हरियाली का प्रतीक है। वास्तव में मॉरिशस का राष्ट्रीय झंडा उसके गौरव और एकता का प्रतीक है वहां डाक टिकट में हिंदी के 4 शब्दों का एक छोटा वाक्य कैथी लिपि में ‘राम गति देहु सुमति’ लिखा हुआ है यह मांगलिक वाक्य बिहार और उत्तर प्रदेश की पाठशालाओं में प्राचीन काल में विद्या अध्ययन प्रारंभ करते हुए बताया जाता था और इसी से शिक्षा प्रारंभ होती थी। यह सुखद आश्चर्य है कि मॉरीशस में शिक्षा प्रारंभ के समय आज भी यही वाक्य के प्रचलित है। मॉरीशस की आत्मा वहां के राष्ट्रगीत में बसती है ।1968 में स्वतंत्र हुए उस देश का राष्ट्रगीत फ्रेंच मूल में जॉ जोर्ज प्रॉस्पेर ने लिखा है, जिसका हिंदी अनुवाद है:

मातृभूमि धन्य तू है,

 हे मातृभूमि मेरी।

मधुर है सुंदरता तेरी,

मधुर है सुगंध तेरी।

हम खड़े हैं चारों ओर तेरे,

एक जन जैसे।

एक राष्ट्र जैसे,

शांति, न्याय और स्वाधीनता में,

हे स्वदेश प्यारे,

हो प्रभु कृपा तुम पर

सदा-सदा के लिए।

लेखक : रांची विश्वविद्यालय के पीजी हिन्दी विभाग के पूर्व विभागाध्यक्ष और केंद्रीय विश्वविद्यालय कोरापुट में हिन्दी के विजिटिंग प्रोफेसर हैं

Share This Article
Leave a comment