चिकित्सा मेरे लिए मानवता की सेवा का जरिया : डॉ देवनीस खेस्स

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इंटरव्यू

दयानंद राय

गठिया के मरीजों की चिकित्सा में डॉ देवनीस खेस्स का कोई सानी नहीं है। बीते 22 सालों से गठिया के मरीजों का इलाज कर रहे डॉ देवनीस खेस्स ने एक दर्जन से अधिक देशों की यात्रा की है और 30 से अधिक इंटरनेशनल मेडिकल कांफ्रेंस और वर्कशॉप में हिस्सा लिया है। डॉ देवनीस खेस्स पूर्व पीएम वीपी सिंह का भी इलाज कर चुके हैं। पीजीआई चंडीगढ़, अपोलो अस्पताल दिल्ली और मेदांता में सेवा दे चुके डॉ देवनीस खेस्स डिवाइन सुपर स्पेशियलिटी अस्पताल और डिवाइन पैथ लैब के डायरेक्टर हैं। उनसे गठिया के मरीजों की चिकित्सा और रोग से जुड़े विभिन्न पहलुओं पर न्यूजवाणी के प्रधान संपादक दयानंद राय ने बातचीत की। प्रस्तुत है उस बातचीत के संपादित अंश।

सवाल : आपके पिता आर्मी में थे। आपकी पारिवारिक पृष्ठभूमि कृषक परिवार की रही है। फिर डॉक्टरी का पेशा आपने चुना इसकी वजह क्या है?
जवाब : मेरे पिता जॉन खेस्स सेना में सिपाही थे और मेरी पारिवारिक पृष्ठभूमि कृषक परिवार की रही है। मेरी स्कूली शिक्षा सिमडेगा के संत जेवियर्स स्कूल समसेरा से हुई है। इसके बाद मैंने जवाहर नवोदय विद्यालय गुमला से 12वीं तक की पढ़ाई की। पढ़ाई के दौरान मेरे बायोलॉजी में 90 प्रतिशत से उपर मार्क्स आते थे।मेरे बैचमेट अशीष मिश्रा ने मुझे कहा कि मेरे लिए डॉक्टरी के पेश में जाना उचित रहेगा। इसके बाद मैंने 1994 में मेडिकल की परीक्षा दी और मेरा सेलेक्शन पीएमसीएच पटना में हो गया। मेडिकल के पेशे में मैं इसलिए आया क्योंकि इसमें डायरेक्ट मानव सेवा होती है। यह एक बेहतर प्रोफेशन होने के साथ मानवता का सेवा का जरिया भी है।
सवाल : देश में गठिया के मरीज कितने हैं और क्या इनकी संख्या में बढ़ोत्तरी हुई है?
जवाब : वर्ष 2008 में देश में गठिया के मरीज लगभग 20 लाख से और इनकी संख्या बढ़कर 2022 में 70 लाख हो गयी।इस हिसाब से बीते 14 सालों में गठिया के मरीजों की संख्या में तीन गुणा से अधिक की बढ़ोत्तरी हुई है।गठिया के मरीज उन क्षेत्रों में अधिक बढ़े हैं जहां सिलिका और कोल डस्ट अधिक निकलती है। झारखंड में सबसे अधिक गठिया के मरीज लोहरदगा, खलारी, धनबाद, जमशेदपुर और चाईबासा में मिलते हैं। गठिया के मरीजों से संबंधित एक महत्वपूर्ण तथ्य ये है कि यह बीमारी पुरुषों की तुलना में महिलाओं को ज्यादा होती है।
सवाल : गठिया क्या है और इसके लक्षण क्या हैं?
जवाब : जोड़ों में दर्द और जोड़ों के आसपास गांठ बनने को गठिया कहा जाता है। अंग्रेजी में इसे अर्थराइटिस कहते हैं। गठिया की बीमारी अंतड़ी से शुरू होती है। इसकी वजह वायरस इंफेक्शन, पेट की खराबी, अल्ट्रा वायलेट रेडिएशन, औद्योगिक प्रदूषण, जीवनशैली में बदलाव और जंक फूड का बढ़ता चलन है।गट माइक्रो बायोम के डिस्टर्बेंस से गठिया की बीमारी अंतड़ी में होती है। बाद में यह फेफड़े और आंखों को प्रभावित करती है। दांतों की ठीक से सफाई न होना भी गठिया होने की एक वजह है।गठिया के लक्षण ये हैं कि इसके मरीज के जोड़ों में सूजन होता और अकड़न होती है। गठिया का ठीक से इलाज न होने पर ये आंखों को अंधा कर सकता है। गठिया के मरीजों को हर्ट अटैक होने का खतरा सामान्य मरीजों से दुगुना रहता है। इनमें ब्रेन स्ट्रोक की संभावना भी रहती है।
सवाल : गठिया की बीमारी का इलाज क्या है और इसमें कितना खर्च आता है?
जवाब : गठिया की बीमारी का बचाव सबसे बेहतर इलाज है। गठिया से बचने के लिए पेट की खराबी को नेगलेक्ट न करें। धूप में छाता लेकर निकलें ताकि अल्ट्रा वायलेट रेडिएशन से बच सकें। दांतों की पूरी सफाई रखें और विटामिन डी 3 की कमी न होने दें तो इस बीमारी से बहुत हद तक बचा जा सकता है। तब भी यदि किसी को गठिया हो गया तो इसका इलाज लंबा चलता है। यदि शुरूआती दौर में गठिया डायग्नोस होने पर मरीज इसका इलाज कराये तो तीन साल तक दवा लेने पर 17 से 29 फीसदी लोगों की गठिया की बीमारी पूरी तरह ठीक हो जाती है। गठिया पूरी तरह से ठीक होनेवाली बीमारी है। इसके इलाज के लिए डॉक्टर के सुपरविजन में सूजन निवारक दवा और एस्टोरॉयड का सीमित इस्तेमाल किया जाता है। इसके मरीज के इलाज के लिए डीमार्ड यानि डिजीज मॉडिफाइंग एंटी रुयूमेटिक ड्रग्स का इस्तेमाल किया जाता है। शुरूआत में ही गठिया के मरीज के इलाज में 2000 रुपये प्रति माह का खर्च आता है।पर यदि कोई मरीज बीच में दवा छोड़ देता है तो फिर बीमारी एडवांस्ड स्तर पर आ जाती है तब बीमारी का इलाज और महंगा हो जाता है। एडवांस्ड स्तर पर बीमारी का इलाज करने पर 10-15 हजार प्रति महीने का खर्च आता है। गठिया की बीमारी का टेस्ट भी महंगा होता है। इसकी पहचान के लिए जो टेस्ट किये जाते हैं उसमें सीबीसी, एचएससीआरपी, आरएफ फैक्टर, एंटी सीसीपी, एचएलए बी 27 और एएनए जांच शामिल है। वहीं इसमें जोड़ों का अल्ट्रासाउंड और एक्स रे भी किया जाता है। इसके अलावा लीवर फंक्शन टेस्ट और किडनी फंक्शन टेस्ट भी कराये जाते हैं। इस बीमारी की जांच में दस से पंद्रह हजार रुपये का खर्च आता है।बीमारी शुरू होने के तुरंत बाद इसका इलाज शुरू हो जाये तो परिणाम बेहतर आते हैं।महिलाओं में यह बीमारी 35 से 45 और 65 से 70 वर्ष की उम्र में अधिक होती है। वहीं, पुरुषों में यह 15 से 45 और 70-75 वर्ष की उम्र में अधिक होती है।
सवाल : अपनी डॉक्टर बनने से अब तक की यात्रा के संबंध में कुछ बतायें?
जवाब : वर्ष 1994 में मेरा पटना पीएमसीएच में सेलेक्शन हुआ। यहां से एमबीबीएस करने के बाद सफदरजंग अस्पताल में मैंने हाउस सर्जनशिप की। इसके बाद फिर पीएमसीएच से एमडी की पढ़ाई की। इसके बाद पीजीआई चंडीगढ़ में रुयूमेटोलॉजी एंड इम्यूनोलॉजी की पढ़ाई करने के बाद इंद्रप्रस्थ अपोलो अस्पताल में एसोसिएट कंसलटेंट के रूप में काम किया। इस दौरान पूर्व प्रधानमंत्री वीपी सिंह का इलाज किया। उन्हें कमर में गठिया की बीमारी थी। बाद में अपोलो अस्पताल रांची और उसके बाद मेदांता में सेवा देने के बाद आनेवाले दिनों में शुरू होनेवाले डिवाइन सुपर स्पेशियलिटी अस्पताल में मैं बतौर डायरेक्टर जुड़ा हूं इसके अलावा डिवाइन पैथ लैब का डायरेक्टर हूं।
सवाल : मेडिकल प्रोफेशन में अपनी प्रतिभा को मांजने के लिए आपने किन-किन देशों में वर्कशॉप और कांफ्रेंस में हिस्सा लिया। आपके कितने रिसर्च पेपर पब्लिश हैं?
जवाब : वर्कशॉप और कांफ्रेंसेज में हिस्सा लेने मैं नौ बार अमेरिका जा चुका हूं। इसके अलावा जर्मनी, स्वीट्जरलैंड, ब्रिटेन, ऑस्ट्रिया, इटली, रोम, एम्सटर्डम और बेल्जियम की यात्रा कर चुका हूं। इसके अतिरिक्त शंधाई, फिलीपींस, मेलबर्न और फ्रांस की यात्रा भी की है। मैंने 30 से अधिक अंतरराष्ट्रीय मेडिकल कांफ्रेंस और वर्कशॉप में हिस्सा लिया है और मेरे 12 रिसर्च पेपर पब्लिश हो चुके हैं। सभी रिसर्च पेपर इंटरनेशनल इंडेक्स और नेशनल जर्नल में पब्लिश हुए हैं। पीजीआई चंडीगढ़ में डर्मेटोलॉजी और इम्यूनोलॉजी की पढ़ाई के दौरान मैं बहुत सारे गठिया और वात रोगों की दवाओं के ट्रायल में भी शामिल रहा हूं।

समाजसेवा में भी रहते हैं आगे

समाज के वंचित तबके के उत्थान में भी डॉ देवनीस खेस्स आगे रहते हैं। इन्होंने समाज के वंचित तबके के उत्थान के लिए एक संस्था बनायी है जिसका नाम इंजोत डहर है। यह वंचित तबके के खिलाड़ियों और मेधावी छात्रों के लिए काम करती है। संस्था समय-समय पर दूर-दराज इलाकों मे फ्री मेडिकल कैम्प करके लोगों का मुफ्त इलाज करती है। इसके जरिये स्कूलों में स्वास्थ्य जगरूकता के लिए सेमिनारों का आयोजन भी किया जाता है।

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