हमारी बढ़ती आबादी-अभिशाप या वरदान?

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महेश कुमार सिन्हा

भारत चीन को पछाड़ कर 142.86 करोड़ की जनसंख्या के साथ पहली बार दुनिया का सर्वाधिक आबादी वाला  देश बन गया है। संयुक्त राष्ट्र की संस्था यूनाइटेड नेशन पापुलेशन फंड की स्टेट आफ वर्ल्ड पापुलेशन रिपोर्ट -2023 के आंकड़ों के मुताबिक चीन के 142.57 के मुकाबले हमारी आबादी 29 लाख ज्यादा है। रिपोर्ट के अनुसार साल 2022 में भारत की आबादी  में 1.5 फीसदी का इजाफा हुआ है। जबकि 2022 में चीन  की आबादी में 8.5 लाख की कमी आयी थी। रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत की औसत उम्र 28 वर्ष है जबकि चीन की 38 साल। भारत की 66 फीसदी  35 साल से कम उम्र की है। हमारे यहां 10-24 वर्ष वाले 26 प्रतिशत हैं,जबकि चीन में इस आयुवर्ग की भागीदारी 18 फीसदी  ही है। यानि भारत आज सर्वाधिक  आबादी वाला ही नहीं, बल्कि सबसे अधिक युवा आबादी वाला देश है। कहने का तात्पर्य यह है कि चीन ने 30 साल पहले जिस युवा आबादी के दम पर आर्थिक उड़ान भरी थी,आज वो ताकत भारत के पास है। ऐसे में यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या हम इस बढ़ती आबादी  का लाभ उठा सकते हैं? बढ़ती जनसंख्या को कुछ लोग अभिशाप मान रहे हैं और इसे चिंता का विषय बता रहे हैं। इनका कहना है कि बढ़ती जनसंख्या की वजह से हमारे समक्ष कई चुनौतियां खड़ी हो गयी है। इतनी बड़ी आबादी के लिए बेहतर स्वास्थ्य, शिक्षा और रोजगार मुहैया कराना जरुरी है। पर इस मामले में  हमारी स्थिति पहले से ही चिंता जनक  बनी हुई है। इसलिए जनसंख्या नियंत्रण के लिए सरकार को अब कोई बड़ा फैसला लेना होगा। जनसंख्या का विस्फोट रोकने  के लिये जनसंख्या नियंत्रण कानून बनाने  की मांग भी उठने लगी है।  हालांकि आर्थिक मामलों के विशेषज्ञ इस बढ़ती आबादी में संभावना देख रहे हैं। इनका मानना है कि सस्ते श्रम और युवा  आबादी के दम पर आर्थिक विकास को रफ्तार दिया जा सकता है, जैसा चीन में हुआ था। लेकिन इसके लिये बेहतर नीति और नीयत की दरकार है। यदि ऐसा हुआ तो बढ़ती आबादी हमारे लिए वरदान भी बन सकती है।

लेखक : न्यूजवाणी के बिहार के प्रधान संपादक हैं और यूनएनआई के ब्यूरो प्रमुख रह चुके हैं

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