रांची के महान संत थे पगला दादा उर्फ केपी चक्रवर्ती

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उनकी वेशभूषा और उनके मुंह से निकलनेवाली गालियां उनके पागल होने का एहसास कराती थी लेकिन सच्चाई ये थी कि वे एक बहुत बड़े संत और मां काली के उपासक थे। जीवन भरे अनिकेत रहनेवाले पगला दादा उर्फ केपी चक्रवर्ती यानि काली प्रसाद चक्रवर्ती रांची के एक ऐसे संत थे जिन्होंने जीवनपर्यंत दुखी लोगों के जीवन को सुखी बनाने के लिए काम किया। पगला दादा के जीवन पर संस्मरण लिखनेवाले पंडित भवभूति मिश्र के शब्दों में पगला दादा रांची जिला स्कूल के विद्यार्थी रह चुके थे और मैट्रिक पास थे। वे चंदननगर के किसी बैंक में मुलाजिम थे। दादा के अपने कोई गुरू थे जिनसे इन्होंने मां काली की दीक्षा ली थी। दीक्षा लेने के कुछ समय के अंतर में इनकी पत्नी और इनके दीक्षागुरू सुरधाम सिधार गये और तब से ये वैरागी हो गये। इसके बाद ये रांची चले आये और यहीं रहने लगे। थड़पखना में इनके परिवार के लोगों का एक घर था। तब रांची ब्रिटिश शासन के अधीन थी और वर्ष था 1946। पगला दादा पूरे रांची शहर में सड़कों पर गालियां देते घूमा करते थे और इसी तरह वे जरूरतमंदों का कल्याण करते थे। पंडित भवभूति मिश्र के ही शब्दों में पगला दादा ने कभी किसी को संन्यासी बनने के लिए प्रेरित नहीं किया। एक बार किसी सज्जन की पत्नी का देहांत हो गया। बच्चे छोटे-छोटे थे। ऐसे में संसार से उनका मन विरक्त हो गया और वे संसार परित्याग की बातें सोचने लगे। तब पगला दादा ने उनसे कहा- ऐ बाबा, किसी वृक्ष की एक शाखा को काट लीजिए और अपने अवलंब के लिए लाठी बना लीजिए न। यह सब क्या सोचते रहते हैं। उन्होंने पूछा कि दादा फिर से विवाह करने के लिए कह रहे हैं। उनका जवाब था यही समझ लीजिए।पगला दादा को जिनका कल्याण करना होता था उनसे वे भिक्षा मांगते थे। भिक्षा में वे नस, इत्र, कागज, पेंसिल और रुपया मांगते थे। इनके मांगते समय दाता समझता था कि इन्हें इनकी जरूरत है। पर ये सब मिल जाने पगला दादा की दृष्टि में इन चीजों का कोई मूल्य नहीं होता था और वे जिसके घर में रहते उसे बिखेर देते थे। एक बार जब पंडित भवभूति मिश्र ने इनसे पूछा कि दादा इतने प्रयत्नों से मांगते हैं, तब उन चीजों पर ख्याल नहीं करते तो फिर मांगते ही क्यों हैं। तब पगला दादा का जवाब था। नहीं बाबा पूजा करना होता है न।सब आकाश में फेंक देता है। तीन जुलाई 1966 को इन्होंने रांची में समाधि ले ली। इससे पहले इन्होंने सैकड़ों लोगों का कल्याण किया। वस्तुत: इनका जीवन दूसरों के कल्याण के लिए था।

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