रामवृक्ष बेनीपुरी जिनका लिखा कॉमा और फुलस्टॉप तक बोलता था : डॉ जंगबहादुर पांडेय

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डॉ जंगबहादुर पांडेय

प्रखर पत्रकार, समाज सुधारक और नवोन्मेष के हिमायती साहित्यकार रामवृक्ष बेनीपुरी शब्दों के जादूगर थे। यह उनकी लेखनी का ही जादू था कि शब्द तो छोड़िए, उनका लिखा कॉमा और फुलस्टॉप तक बोलता था। आज उनकी जयंती है ऐसे में यह जरूरी है कि साहित्य के इस पुरोधा के प्रति मैं अपने शब्द निवेदित करूं। बिहार हिंदी साहित्य सम्मेलन के संस्थापकों में से एक रामवृक्ष शर्मा बेनीपुरी का जन्म 23 दिसंबर 1899 ई. में बिहार के मुजफ्फरपुर जिले के ‘बेनीपुरी’ गांव में हुआ था।बचपन में ही इनके माता-पिता का स्वर्गवास हो गया।अत: इनका लालन-पालन और प्रारंभिक शिक्षा ननिहाल में हुई।आम तौर पर ननिहाल में पलने वाले बच्चे बिगड़ जाते हैं, लेकिन रामवृक्ष बेनीपुरी इसके अपवाद साबित हुए। इन्होंने हिंदी साहित्य सम्मेलन से प्रथमा और विशारद की परीक्षाएं उत्तीर्ण की। 1920 ई. में मैट्रिक पास करने के पूर्व ही महात्मा गांधी के आह्वान पर ये स्वाधीनता संग्राम में कूद पड़े। 1930 से 1942 ई. तक इन्हें 12 दफा जेल की यात्रा करनी पड़ी। ‘रामचरितमानस’ के नियमित पठन-पाठन से साहित्य और कविता के क्षेत्र में इनकी रूचि जाग्रत हुई। स्कूल-काल से ही इनकी रचनाएं पत्र-पत्रिकाओं में छपने लगी थी। इनकी पहली रचना प्रसिद्ध पत्रिका ‘प्रताप’ में छपी थी। कविता से ये शीघ्र ही गद्य के क्षेत्र में आ गए और पत्रकारिता के माध्यम से भी राष्ट्र सेवा करने लगे। इन्होंने अनेक पत्र-पत्रिकाओं का संपादन किया, जिनमें प्रमुख हैं तरुण-भारत, किसान ,मित्र, बालक, युवक, लोकसंग्रह, कर्मवीर, योगी, जनता, हिमालय, नई धारा तथा चुन्नू-मुन्नू आदि। सात सितंबर 1968 ई. में इनका निधन हो गया। रामवृक्ष बेनीपुरी की गिनती हिंदी के समर्थ निबंधकार, संस्मरण तथा रेखाचित्र लेखक के रूप में की जाती है। इन्होंने लगभग एक सौ ग्रंथों का प्रणयन किया है, जिनमें प्रमुख हैं। उपन्यास-पतितों के देश में (1930-32), कैदी की पत्नी(1940)।कहानी संग्रह-चिता के फूल (1930-32), संसार की मनोरम कहानियां।रेखा चित्र-लाल तारा (1937-39),  माटी की मूरतें (1941-45)।निबंध-गेहूं और गुलाब (1948-50) मशाल वंदे वाणी विनायकौ (ललित निबंध)।संस्मरण-मील का पत्थर, जंजीरें और दीवारें,। मुझे याद है। इसमें माटी की मूरतें का साहित्य अकादमी की ओर से अन्य भारतीय भाषाओं में भी अनुवाद किया जा चुका है।)। नाटक -अम्बपाली (1941-45), नेत्रदान (1948-50), सीता की मां (1948-50), संघमित्रा (1948-50), अमर ज्योति (1951) तथागत(1952)। यात्रा वृतांत -पैरो में पंख बांधकर।जीवनी-जयप्रकाश, रोजा, लुक्जेम्बर्ग।जय प्रकाश की विचारधारा (चितंन परक निबंध।बाल साहित्य-अमर कथाएं, बिलाई मौसी, बेटे हो तो ऐसे, बेटियां हों तो ऐसीं,हमारे पुरखे, हमारे पड़ोसी, प्रकृति पर विजय,पृथ्वी पर विजय,हीरामन तोता, बच्चों के बापू, सियार पांडे  आदि। अन्य संपादित ग्रंथ-विद्यापति की पदावली (संपादित),  मेरी डायरी (डायरी) बिहारी सतसई की सुबोध टीका,  लालचीन, जान हथेली पर, आविष्कार और आविष्कारक, नई नारी, रवीन्द्र भारती आदि। (बेनीपुरी का साहित्य ‘बेनीपुरी ग्रंथावली’ में प्रकाशित है।)

अद्भुत थी समाज कल्पना

एकता और समता के पक्षधर बेनीपुरी जी की समाज कल्पना अद्भुत थी।सामान्य किसान परिवार में जन्मे बेनीपुरी यद्यपि एक ग्रामीण व्यक्ति थे, किन्तु इन्होंने अपनी साधना से ज्ञान और मान पा लिया था। साहित्य, पत्रकारिता और राजनीति से समन्वित इनकी दृष्टि सदा समाज की उन्नति और विकास की ओर अग्रसर थी। इन्होंने अपने जीवन में जो कुछ देखा, भोगा और अनुभव किया। साहित्य में उसी की अभिव्यक्ति की।जीवन की विकासोन्मुख धारा में जहां कही सामाजिक रूढ़ियां और कुरीतियां दिखाई दीं, इन्होंने उसका निराकरण करते हुए नया समाज बनाने की आकांक्षा प्रकट की।उन्होंने गुलाम भारत की पीड़ा देखी और भोगी  थी और आजाद भारत में राम राज्य की स्थापना करना चाहते थे। उनकी अभिलाषा थी, समृद्ध भारत देखने की और शाश्वत भारत लिखने की।

प्रेम विवाह के हिमायती थे रामवृक्ष बेनीपुरी

रामवृक्ष बेनीपुरी प्रेम विवाह और अंतर्जातीय विवाह के हिमायती थे।उनका मानना था कि ऐसे संबंध होने से विश्व में कल्याण कारी भावनाओं का उदय होगा,विश्व मैत्री की भावना बढ़ेगी, एक दूसरे के प्रति अपनत्व होगा।ये भावनाएं मन की कुत्सित बुराइयों को दूर करने में सहायक और समर्थ होंगी।बेनीपुरी जी अनोखे शब्द चित्रकार थे।बिहार में तीन ऐसे शैलीकार उत्पन्न हुए, जिन्होंने अपनी शैली से साहित्याकाश में अमरता प्राप्त कर ली। उनमें आचार्य शिवपूजन सहाय,राजा राधिकारमणप्रसाद सिंह और  रामवृक्ष बेनीपुरी के नाम शामिल हैं।सहाय जी की शैली तत्सम प्रधान थी, बेनीपुरी की शैली तद्भव प्रधान, जबकि राजा राधिकाररमण प्रसाद की शैली उर्दू मिश्रित थी। विशिष्ट प्रकार की अलंकृत भाषा, भावुकता तथा विशिष्ट शब्द शिल्प के कारण हिन्दी गद्य के इतिहास में बेनीपुरी जी का अपना विशिष्ट स्थान है। उनकी ‘माटी की मूरतें’ रेखा चित्र बहुत प्रसिद्ध है। इसमें सामाजिक जीवन तथा व्यक्तियों की सहज सरस अनुभूति है।इसमें 12 रेखा चित्र हैं। जो क्रमश: रजिया;बलदेव सिंह सरजू भैया, मंगर, रूपा की आजी, देव, बालगोविंद भगत, भौजी, परमेसर, बैजू मामा, सुभान खां और बुधिया है।इसकी भूमिका में रामवृक्ष बेनीपुरी ने लिखा है कि “ये मूरतें, न इनमें कोई खूबसूरती है,न रंगीनी। ……..ये माटीं की बनी हैं,माटी पर धरी हैं,इसीलिए जिंदगी के नजदीक हैं,जिंदगी से सराबोर हैं।ये देखती हैं सुनती हैं,खुश होती हैं,शाप देती हैं,आशीर्वाद देती हैं।”गेहूं और गुलाब में गेहूं भूख का प्रतीक है तो गुलाब कला और संस्कृति का।मानवीय जीवन में जितना महत्व भूख है उतना ही महत्व कला और संस्कृति का।बेनीपुरी जी की भाषा में या तो आवेगमयता है या प्रशांति।उसमें जटिलता कही नहीं है।बेनीपुरी दो टूक लिखने में विश्वास करते थे।जिस राम चरित मानस से उन्हें पढ़ने-लिखने की प्रेरणा मिली उसके नायक मर्यादा पुरुषोत्तम राम को वे आधा ही वीर मानते थे।उन्होंने लिखा है कि हमने सुन रखा था दुनिया में साढ़े तीन ही वीर हैं। पहला भैंसा, दूसरा सूअर, तीसरा गेहुंअन और आधा राजा रामचंद्र। भैंसा, सूअर और गेहुंवन सीधा वार करते हैं और कभी पीठ नहीं दिखाते।राम चंद्र वीर थे, लेकिन बाली को मारने के लिए उन्होंने पेड़ की ओट ली थी।” ऐसी दो टूक बात बेनीपुरी ही लिख सकते थे। बेनीपुरी नारियों की उन्नति के परम हिमायती थे।उन्होंने लिखा है।”सामाजिक क्रांति की अग्नि में स्त्रियों की गुलामी भी जलने वाली है,समय के प्रवाह को कोई रोक नही सकता”।इन्होंने समाज के विकास में नारी की अनिवार्यता बतायी है।इनके इसी सपने को साकार करने के लिए मुजफ्फरपुर में बेनीपुरी महिला कॉलेज की स्थापना हुई है।वे संपूर्ण भारतीय समाज में एकता और समता के पक्षधर थे।समाजवादी चितंन से प्रभावित हो उन्होंने मनुष्यता को टुकडे में बाटने वाली जाति, वर्ण और धर्म के खिलाफ विद्रोह का बिगूल फूंक दिया था।यह 1930 के आसपास की घटना है, जब शिखा सूत्र टाइटिल सब कुछ सदा के लिए उन्होंने त्याग दिया।स्वयं बेनीपुरी जी के शब्दों में।”ज्यों ही राजनीति में आने की सोची,सबसे पहले मैंने धर्म और जाति-पांति से अपने को दूर करने का निर्णय कर लिया।धर्म का आधार भगवान है।मैं भगवान से भी द्रोह कर बैठा।””कहां बचपन का वह चंदन टीका,कहां किशोरावस्था का ब्राह्मणत्व और गायत्री का प्रतिदिन जाप और कहां एक मैं हूं किअपनी चुटिया काट डाली, जनेऊ उतार फेंका,अपने नाम की उपाधि शर्मा हटा दी और जोरों से कहने लगा भगवान से बचो,सबसे बड़ा भूत वही है।जब तक तुम्हारे सिर पर वह भूत है,कोई अच्छा कार्य नहीं कर सकते।”विकासोन्मुख और समता मूलक समाज की स्थापना चाहने वाले बेनीपुरी जी के संपूर्ण साहित्य में जीवन को आगे बढ़ाने वाली नयी दिशा दृष्टिगोचर होती है। यदि जीवन को सीधे सादे ढ़ंग से कह देना ही कला की सबसे बड़ी विशेषता है तो बेनीपुरी जी इसके सबसे बड़े परमाचार्य हैं। बेनीपुरी जी एक सच्चे समाज सुधारक, कुशल राजनीतिज्ञ, सफल साहित्यकार और प्रखर पत्रकार थे।यही कारण है कि राष्ट्र कवि रामधारी सिंह दिनकर ने कहा था कि नाम से दिनकर मैं था काम से असली सूर्य बेनीपुरी जी थे। रामवृक्ष बेनीपुरी के संदर्भ में कतिपय साहित्य मनीषियों के उदगार द्रष्टव्य हैं।”यदि हमसे प्रश्न किया जाय कि आजकल हिंदी का सर्वश्रेष्ठ शब्द चित्र कार कौन है,तो हम बिना किसी संकोच के बेनीपुरी का नाम उपस्थित कर देंगे।”बनारसी दास चतुर्वेदी, “यह लेखनी है या जादू की छड़ी है आपके हाथ में।”राष्ट्र कवि मैथिली शरण गुप्त,”बेनीपुरी की सजीव लेखनी वास्तविकता और साथ ही रस और सौन्दर्य की पराकाष्ठा साहित्य की सर्वोत्कृष्ट कृत्यों में “।राहुल सांकृत्यायन, आधुनिक साहित्य निर्माताओं में आपका अनूठा स्थान है।कला मनीषी राय कृष्ण दास, गद्य साहित्य को अभूतपूर्व देन-साहित्य सृजन का नया आदर्श, उदार दृष्टिकोण ज्योतिर्मय व्यक्तित्व, जगदीश चंद्र माथुर। अस्तु रामवृक्ष बेनीपुरी जैसे शब्दों के जादूगर का हिंदी भाषा में होना हिन्दी भाषा के लिए सम्मान और गौरव का संदर्भ है।

लेखक : रांची विश्वविद्यालय के पीजी हिन्दी विभाग के पूर्व विभागाध्यक्ष और न्यूजवाणी के संपादकीय सलाहकार हैं।

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