बड़ा सवाल यह है कि जेल मैनुअल में विशेष प्रावधान किस परिस्थिति में किया गया था?

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पटना : गोपालगंज के तत्कालीन जिलाधिकारी जी. कृष्णैया हत्याकांड के दोषी आनंद मोहन की रिहाई पर देश भर में उठ रहे सवालों का जवाब देने में बिहार सरकार परेशान है। पहले मुख्य सचिव आमिर सुबहानी ने  सफाई दी। उसके बाद खुद मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को मोर्चा सम्भालना पड़ा। नीतीश कुमार ने कहा है कि केन्द्र सरकार द्वारा 2016 में भेजे गये मैनुअल और अन्य राज्यों के प्रावधान को देखते हुये बिहार के जेल मैनुअल में  संशोधन किया  गया है।  उन्होंने कहा कि केन्द्र के मैनुअल में किसी  के लिये विशेष  प्रावधान नहीं है। किसी राज्य में  भी नहीं है। लेकिन बिहार में था,जिसे हटा दिया गया है। अब सभी के लिये बराबर हो गया। मुख्यमंत्री ने मीडिया के समक्ष सवाल किया  कि क्या सरकारी अधिकारी और सामान्य नागरिक  की हत्या में  फर्क होना चाहिये? ऐसा कहीं होता है? नीतीश कुमार के इस बयान पर सवाल उठने लगे हैं।नीतीश कुमार अब जो आम और खास की बात कर रहे हैं, यह सवाल आया कहां से? बिहार में  नया जेल मैनुअल 2012 से लागू है। लेकिन 26 मई 2016 को जेल मैनुअल के नियम 48 (1)(क) में अपवाद जुड़ा जिसमें ‘सरकारी काम पर तैनात लोक सेवक की हत्या जैसे जघन्य मामलों में हत्या हेतु आजीवन कारावास में हों, रिहा नहीं होंगे। जोड़ा गया। यही अपवाद आनंद मोहन की रिहाई में बाधक था। ऐसे में सरकार ने 10 अप्रैल 2023 को उक्त नियम में संशोधन कर ‘काम पर तैनात लोक सेवक की हत्या’ अंश को हटा दिया। इसी से आनंद मोहन की रिहाई का रास्ता साफ हो गया। हालांकि कानूनविदों की राय में जेल मैनुअल में संशोधन करने का अधिकार सरकार को है। यह कानूनी तौर पर गलत नहीं है क्योंकि इसका लाभ एक को नहीं, सबको मिलेगा। लेकिन बड़ा  सवाल यह  है कि जेल मैनुअल के उक्त नियम में वह अपवाद किस परिस्थिति में जोड़ा गया था और  अब किस कारण हटाया गया है।   राजनीतिक हलकों में तो चर्चा यही है कि जेल मैनुअल के नियमावली में दोनों संशोधनों के केन्द्र में आनंद मोहन ही रहे हैं। नियम में पहला संशोधन उन्हें फंसाने के लिये किया गया था और दूसरा निकालने के लिये हुआ। भले ही उनकी आड़ में कई अन्य लोग भी बाहर निकल गये। इसे संयोग ही कहेंगे कि नियमावली में दोनों संशोधन मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के नेतृत्व  वाली महागठबंधन सरकार के शासन काल में ही हुए।

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