शराबबंदी के नफे-नुकसान को लेकर छिड़ी बहस पर अटकी हुई है बिहार की राजनीति की सुई

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महेश कुमार सिन्हा

पटना : बिहार की राजनीति की सुई अभी शराबबंदी के नफे-नुकसान को लेकर छिड़ी बहस पर अटकी हुई है। इसकी वजह से लोक हित और जन सरोकार के मुद्दे फिलहाल गौण हो गये हैं। छपरा में पिछले कुछ दिनों में जहरीली शराब से करीब 100 लोगों की मौत के बाद इसको लेकर सरकार और विपक्ष के बीच घमासान मचा हुआ है। विपक्षी भाजपा के साथ-साथ महागठबंधन सरकार में शामिल और उसे समर्थन दे रही पार्टियों के नेता भी मृतकों के परिजनों को मुआवजा देने और शराबबंदी कानून की सभीक्षा करने की मांग कर रहे हैं। लेकिन मुख्यमंत्री नीतीश कुमार इससे साफ इंकार कर रहे हैं। उनका कहना है कि राज्य में पूर्ण शराबबंदी लागू है और पीना भी गुनाह है। फिर पी कर मरने पर मुआवजा किस बात  का। वह बार-बार यही कह रहे हैं “जो पियेगा वो मरेगा” इसमे मुआवजा  कैसा? इस मसले पर सरकार खासकर,सीएम रुख और विपक्षी भाजपा सदस्यों के हंगामे से विधानमंडल का  पांच दिवसीय  संक्षिप्त शीतकालीन सत्र पूरी तरह शराब की भेंट चढ़ गया। विधानमंडल के दोनों सदनों की कार्यवाही अनिश्चित काल तक के लिये स्थगित किये जाने के बाद अब यह मुद्दा सड़क पर गरमायेगा,ऐसे संकेत मिले हैं। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के अड़ियल रुख और उनके दुर्भाग्यपूर्ण बयान के विरोध में भाजपा के विधायक और विधान पार्षद बुधवार को विधानसभा परिसर में दिन के 11 बजे से दोपहर एक बजे तक धरना देंगे। इसका नेतृत्व विधान सभा में प्रतिपक्ष के नेता विजय  सिन्हा और विधान परिषद में  नेता प्रतिपक्ष सम्राट  चौधरी  संयुक्त रुप से करेंगे। उधर सीएम नीतीश कुमार ने कहा है कि शराबबंदी के फायदे को जानने के लिये सर्वे कराया जायेगा। इससे पता चलेगा कि शराबबंदी के बाद क्या-क्या बदलाव आये हैं।

लेखक : न्यूजवाणी के बिहार के प्रधान संपादक हैं और यूएनआई के ब्यूरो चीफ रह चुके हैं

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