सफीदों, (एस• के• मित्तल) : श्री कृष्ण भक्ति भागवत समिति के तत्वावधान में पितृ पक्ष के उपलक्ष्य में नगर के ऐतिहासिक नागक्षेत्र सरोवर परिसर में आयोजित श्रीमद्भागवत कथा महोत्सव में बुधवार को श्रद्धा और भक्ति का अद्भुत संगम देखने को मिला। कथा व्यास पीठाधीश्वर परम स्वामी कैवल्यानंद सरस्वती महाराज ने श्रद्धालुओं को वामन अवतार, राजा बलि की भक्ति एवं समर्पण, राजा भगीरथ की तपस्या, गंगा अवतरण और भगवान श्रीराम के जन्म की लीला का भावपूर्ण वर्णन सुनाया। व्यास पीठाधीश्वर परम स्वामी कैवल्यानंद सरस्वती महाराज ने वामन अवतार का प्रसंग सुनाते हुए कहा कि भगवान विष्णु ने वामन रूप धारण कर राजा बलि से तीन पग भूमि का दान मांगा। राजा बलि ने भगवान की मांग स्वीकार कर ली। इसके बाद भगवान वामन ने विराट स्वरूप धारण किया। उन्होंने अपने पहले पग में त्रिलोकी को नाप लिया और दूसरे पग में दसों दिशाओं को अपने चरणों में समेट लिया। स्वामी कैवल्यानंद सरस्वती महाराज ने कथा को आगे बढ़ाते हुए बताया कि जब भगवान ने राजा बलि से पूछा कि अब तीसरा पग कहां रखा जाए, तब राजा बलि ने अपना सिर भगवान के चरणों के लिए प्रस्तुत कर दिया। राजा बलि के समर्पण से प्रसन्न होकर भगवान ने उनके सिर पर अपना चरण रखा और उन्हें सुतल लोक भेज दिया। उन्होंने कहा कि राजा बलि की कथा हमें बताती है कि सच्ची भक्ति में अहंकार का कोई स्थान नहीं होता। भगवान के प्रति पूर्ण समर्पण करने वाला भक्त सदैव उनकी कृपा का पात्र बनता है। कथा के दौरान स्वामी कैवल्यानंद सरस्वती महाराज ने राजा भगीरथ की कठोर तपस्या और मां गंगा के पृथ्वी पर अवतरण का भी विस्तार से वर्णन किया। उन्होंने बताया कि अपने पूर्वजों के उद्धार के लिए राजा भगीरथ ने मां गंगा को पृथ्वी पर लाने के लिए कठोर तपस्या की। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर मां गंगा पृथ्वी पर आने के लिए तैयार हुईं, लेकिन उनके वेग को पृथ्वी सहन नहीं कर सकती थी। ऐसे में भगवान भोलेनाथ ने मां गंगा को अपनी जटाओं में धारण किया और उनके प्रचंड वेग को नियंत्रित किया। इसके बाद गंगा की पवित्र धारा भगवान शिव की जटाओं से निकलकर पृथ्वी पर प्रवाहित हुई। महाराज जी ने भगवान श्रीराम के जन्म की लीला का भी भावपूर्ण वर्णन करते हुए कहा कि श्रीराम का जीवन मनुष्य को कठिन परिस्थितियों में भी सत्य और कर्तव्य के मार्ग पर चलते रहने की प्रेरणा देता है। उन्होंने कहा कि रामायण और श्रीमद्भागवत की कथाएं केवल सुनने के लिए नहीं, बल्कि उनके संदेश को जीवन में उतारने के लिए हैं।
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