“मौत की घोषणा के बाद लौटी सांसें: अस्पताल की बड़ी चूक या किस्मत का खेल”

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medical negligence

सड़क हादसे के घायल युवक को मृत मान लिया गया,

रेफर करते वक्त दिखे जीवन के संकेत

सड़क हादसे के बाद सामने आई यह घटना न सिर्फ चौंकाने वाली है, बल्कि निजी अस्पतालों में इलाज की प्रक्रिया और ज़िम्मेदारी पर भी सवाल खड़े करती है। एक युवक गंभीर रूप से घायल अवस्था में सड़क दुर्घटना के बाद नजदीकी निजी अस्पताल में भर्ती कराया गया था। प्राथमिक जांच के बाद अस्पताल प्रबंधन ने युवक को मृत घोषित कर दिया और परिजनों को इसकी सूचना दे दी गई।

परिजनों के अनुसार, अस्पताल स्टाफ ने बताया कि युवक की जान नहीं बच सकी और आगे किसी तरह का इलाज संभव नहीं है। इसके बाद युवक को रोहतक स्थित पीजीआई रेफर किया गया। हैरानी की बात तब सामने आई जब रास्ते में एंबुलेंस स्टाफ और परिजनों को युवक के शरीर में हरकत और सांस के संकेत दिखाई दिए। तत्काल इसकी जानकारी दी गई और युवक को पीजीआई रोहतक में भर्ती कराया गया, जहां डॉक्टरों ने पुष्टि की कि वह जीवित है और उसका इलाज शुरू किया गया।

इस घटना के बाद परिजनों में गुस्सा और आक्रोश देखने को मिला। उनका आरोप है कि निजी अस्पताल ने बिना पूरी जांच और आवश्यक मेडिकल प्रोटोकॉल अपनाए युवक को मृत घोषित कर दिया। यदि समय रहते उसे दूसरे अस्पताल न ले जाया जाता, तो उसकी जान को गंभीर खतरा हो सकता था।

चिकित्सा विशेषज्ञों का कहना है कि गंभीर सड़क हादसों में मरीज की नब्ज, सांस और न्यूरोलॉजिकल स्थिति की गहन जांच बेहद जरूरी होती है। किसी भी मरीज को मृत घोषित करने से पहले निर्धारित प्रक्रियाओं का पालन अनिवार्य है।

मामले की जानकारी मिलने के बाद स्वास्थ्य विभाग ने घटना की जांच के संकेत दिए हैं। यह घटना न केवल चिकित्सा लापरवाही का संभावित उदाहरण है, बल्कि यह भी दिखाती है कि सही समय पर लिया गया निर्णय कभी-कभी किसी की जिंदगी बचा सकता है।

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