रोजगार योजना को लेकर आमने-सामने भाजपा और कांग्रेस, आरोप-प्रत्यारोप तेज
नूंह जिले में महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (मनरेगा) इन दिनों रोजगार सृजन से ज्यादा राजनीतिक बहस का विषय बन गई है। एक ओर भाजपा इस योजना को ग्रामीण गरीबों के लिए वरदान बता रही है, वहीं दूसरी ओर कांग्रेस ने मनरेगा के क्रियान्वयन में गंभीर धांधली और अनियमितताओं के आरोप लगाए हैं। इस टकराव के चलते योजना का मूल उद्देश्य कहीं न कहीं पीछे छूटता नजर आ रहा है।
भाजपा नेताओं का कहना है कि मनरेगा के माध्यम से नूंह के ग्रामीण क्षेत्रों में हजारों जरूरतमंद परिवारों को रोजगार मिला है। पार्टी के अनुसार, योजना ने मजदूरों को उनके गांव में ही काम देकर पलायन पर रोक लगाई है और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती दी है। भाजपा का दावा है कि केंद्र और राज्य सरकार की मंशा साफ है और मनरेगा के तहत पारदर्शिता सुनिश्चित की जा रही है।
वहीं कांग्रेस ने मनरेगा को लेकर सरकार पर तीखे सवाल खड़े किए हैं। कांग्रेस नेताओं का आरोप है कि कई जगहों पर कागजों में काम दिखाकर भुगतान कर दिया गया, जबकि जमीनी स्तर पर कार्य हुए ही नहीं। उन्होंने मजदूरों की हाजिरी, भुगतान में देरी और फर्जी मस्टर रोल की शिकायतें भी गिनाईं। कांग्रेस का कहना है कि यदि निष्पक्ष जांच कराई जाए, तो बड़े स्तर पर गड़बड़ियां सामने आ सकती हैं।
राजनीतिक बयानबाजी के बीच ग्रामीण मजदूर असमंजस में नजर आ रहे हैं। कई मजदूरों का कहना है कि उन्हें समय पर काम और मजदूरी नहीं मिल पा रही, जबकि कुछ का मानना है कि योजना से उन्हें लाभ भी हुआ है। हालांकि वे इस बात पर सहमत हैं कि राजनीति के बजाय योजना के सही क्रियान्वयन पर ध्यान दिया जाना चाहिए।
प्रशासनिक अधिकारियों का कहना है कि मनरेगा से जुड़े मामलों की समय-समय पर जांच की जाती है और जहां भी शिकायतें मिलती हैं, वहां कार्रवाई की जाती है। अधिकारियों ने दावा किया कि योजना को पारदर्शी बनाने के लिए ऑनलाइन निगरानी व्यवस्था भी लागू की गई है।
कुल मिलाकर नूंह में मनरेगा योजना फिलहाल रोजगार गारंटी से ज्यादा राजनीतिक अखाड़ा बनती दिख रही है। यदि राजनीतिक दल आरोप-प्रत्यारोप से ऊपर उठकर योजना के वास्तविक लाभार्थियों पर ध्यान दें, तो इसका उद्देश्य सही मायनों में पूरा हो सकता है।
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