अंकों के मामूली अंतर पर छूटा चयन, अब दोबारा मूल्यांकन की संभावना बढ़ी
हरियाणा की एक अभ्यर्थी के लिए न्यायिक सेवा में प्रवेश का रास्ता एक बार फिर खुलता नजर आ रहा है। सिविल जज भर्ती प्रक्रिया में बेहद मामूली अंतर से चयन से वंचित रह गई उम्मीदवार को अब राहत मिलने की उम्मीद जगी है। शीर्ष अदालत ने मामले को गंभीरता से लेते हुए संबंधित उच्च न्यायालय से पुनर्विचार करने को कहा है।
जानकारी के अनुसार, अभ्यर्थी चयन सूची से बहुत ही कम अंकों के अंतर से बाहर रह गई थी। यह अंतर इतना कम था कि इसे लेकर उसने न्यायिक प्रक्रिया का सहारा लिया। उसका तर्क था कि मूल्यांकन या प्रक्रिया में किसी भी प्रकार की त्रुटि उसकी मेहनत पर भारी पड़ सकती है, इसलिए मामले की निष्पक्ष जांच जरूरी है।
शीर्ष अदालत के हस्तक्षेप के बाद अब संबंधित उच्च न्यायालय से इस मामले की दोबारा समीक्षा करने को कहा गया है। इससे अभ्यर्थी को उम्मीद जगी है कि यदि पुनर्मूल्यांकन में कोई बदलाव होता है, तो उसे चयन का अवसर मिल सकता है।
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह के मामलों में पारदर्शिता और निष्पक्षता बनाए रखना बेहद जरूरी होता है, खासकर जब अंतर बहुत कम हो। यह फैसला न केवल एक उम्मीदवार के लिए महत्वपूर्ण है, बल्कि भविष्य में अन्य अभ्यर्थियों के लिए भी एक उदाहरण बन सकता है।
अब सभी की नजरें उच्च न्यायालय के आगामी निर्णय पर टिकी हैं, जो यह तय करेगा कि अभ्यर्थी को न्यायिक सेवा में स्थान मिल पाता है या नहीं। फिलहाल यह मामला न्याय और अवसर की दृष्टि से बेहद अहम माना जा रहा है।
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