दलीय आधार पर चुनाव न होने का तर्क अब राजनीतिक दलों के लिए खुद एक बड़ी चुनौती बनता जा रहा है। इसी बहाने कई नेता और कार्यकर्ता खुलेआम पार्टी अनुशासन की अनदेखी कर रहे हैं। अंदरखाने असंतोष अब सार्वजनिक बयानबाजी और अलग-अलग गुटों की सक्रियता में बदल चुका है, जिससे पार्टी नेतृत्व की मुश्किलें बढ़ गई हैं।
सूत्रों के मुताबिक, संगठन ने जिन सीमाओं को ‘लक्ष्मण रेखा’ माना था, उन्हें पार करने की घटनाएं लगातार सामने आ रही हैं। कुछ नेता इसे स्थानीय मजबूरी बता रहे हैं, तो कुछ इसे लोकतांत्रिक स्वतंत्रता का नाम दे रहे हैं। लेकिन जानकारों का मानना है कि अगर समय रहते सख्ती नहीं दिखाई गई, तो यह ‘डैमेज’ आने वाले चुनावों में पार्टी को भारी नुकसान पहुंचा सकता है।
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