प्रसव के दौरान लापरवाही का गंभीर आरोप, पति बोला- 7 घंटे तक होती रही ब्लीडिंग, मदद मांगने पर की मारपीट

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Pregnant Woman

एक सरकारी स्वास्थ्य केंद्र में गर्भवती महिला के इलाज को लेकर गंभीर लापरवाही के आरोप सामने आए हैं। महिला के पति का दावा है कि उसकी गर्भवती पत्नी को करीब सात घंटे तक ब्लीडिंग होती रही, लेकिन वहां मौजूद स्टाफ ने समय पर ध्यान नहीं दिया। पति ने आरोप लगाया कि कर्मचारी मोबाइल फोन में व्यस्त रहे और जब वह उन्हें बुलाने गया तो उसके साथ ही मारपीट की गई।

पति के मुताबिक वह अपनी गर्भवती पत्नी को डिलीवरी के लिए सरकारी स्वास्थ्य केंद्र लेकर पहुंचा था। महिला की हालत बिगड़ने के साथ लगातार ब्लीडिंग होने लगी। परिवार का आरोप है कि उन्होंने कई बार कर्मचारियों से महिला को देखने और उपचार शुरू करने की गुहार लगाई।

परिजनों का दावा है कि स्टाफ ने उनकी शिकायत को गंभीरता से नहीं लिया। पति के अनुसार उसकी पत्नी दर्द और ब्लीडिंग से परेशान थी, जबकि वहां मौजूद कुछ कर्मचारी फोन इस्तेमाल करने में व्यस्त थे।

पति ने आरोप लगाया कि करीब सात घंटे तक उसकी पत्नी की स्थिति में सुधार नहीं हुआ। वह बार-बार स्टाफ को बुलाने जाता रहा, लेकिन उसे संतोषजनक जवाब नहीं मिला।

मामले में सबसे गंभीर आरोप स्वास्थ्यकर्मियों की कथित टिप्पणी को लेकर है। पति का दावा है कि मदद मांगने पर उससे कहा गया कि ‘बच्चा मरे या जच्चा, हमें क्या।’ हालांकि इस कथित टिप्पणी की स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं हुई है और संबंधित कर्मचारियों का पक्ष सामने आने के बाद ही स्थिति स्पष्ट होगी।

पति का आरोप है कि जब वह पत्नी की बिगड़ती हालत को देखकर कर्मचारियों को दोबारा बुलाने पहुंचा तो उसके साथ बहस शुरू हो गई। विवाद बढ़ने पर कुछ लोगों ने उसके साथ मारपीट की।

घटना के बाद परिवार ने स्वास्थ्य केंद्र की व्यवस्था और कर्मचारियों के व्यवहार पर सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि गर्भवती महिला की स्थिति को देखते हुए तत्काल चिकित्सा सहायता मिलनी चाहिए थी।

गर्भावस्था के दौरान अत्यधिक ब्लीडिंग को चिकित्सकीय रूप से गंभीर स्थिति माना जाता है। ऐसी परिस्थिति में मरीज की जांच और आवश्यक उपचार में देरी होने पर जोखिम बढ़ सकता है। हालांकि इस मामले में महिला की वास्तविक चिकित्सकीय स्थिति का आकलन मेडिकल रिकॉर्ड और डॉक्टरों की रिपोर्ट से ही किया जा सकता है।

परिजनों ने पूरे घटनाक्रम की जांच कराने की मांग की है। उनका कहना है कि अस्पताल में मौजूद CCTV फुटेज, ड्यूटी रिकॉर्ड और मरीज के उपचार से संबंधित दस्तावेजों की जांच की जाए।

यदि परिवार की शिकायत पर विभागीय जांच शुरू होती है तो यह देखा जा सकता है कि महिला को अस्पताल कब लाया गया, उसकी पहली जांच किस समय हुई और इलाज के दौरान क्या-क्या चिकित्सा सहायता दी गई।

इसके साथ ही ड्यूटी पर मौजूद डॉक्टरों और अन्य स्वास्थ्य कर्मचारियों के बयान भी महत्वपूर्ण होंगे। इससे यह स्पष्ट हो सकेगा कि इलाज में वास्तव में देरी हुई थी या इसके पीछे कोई चिकित्सकीय कारण था।

पति के साथ कथित मारपीट का मामला भी अलग से जांच का विषय हो सकता है। यदि इस संबंध में पुलिस शिकायत दी जाती है तो CCTV फुटेज और प्रत्यक्षदर्शियों के बयान के आधार पर कार्रवाई की जा सकती है।

सरकारी अस्पतालों और स्वास्थ्य केंद्रों में प्रसव के लिए पहुंचने वाली महिलाओं को समय पर चिकित्सा सुविधा उपलब्ध कराना बेहद महत्वपूर्ण है। ऐसे में सात घंटे तक इलाज नहीं मिलने के आरोप गंभीर सवाल खड़े करते हैं।

हालांकि किसी भी कर्मचारी को जांच पूरी होने से पहले दोषी नहीं ठहराया जा सकता। स्वास्थ्य विभाग की जांच में मरीज के रिकॉर्ड, कर्मचारियों के बयान और उपलब्ध वीडियो साक्ष्यों से वास्तविक घटनाक्रम सामने आ सकता है।

परिवार का कहना है कि उनकी प्राथमिकता महिला और बच्चे की सुरक्षा थी और इसी कारण पति लगातार स्टाफ से मदद मांग रहा था। उनका आरोप है कि मदद मिलने के बजाय उसके साथ दुर्व्यवहार किया गया।

मामला सामने आने के बाद स्वास्थ्य विभाग की प्रतिक्रिया पर नजर बनी हुई है। यदि जांच में लापरवाही साबित होती है तो जिम्मेदार कर्मचारियों के खिलाफ विभागीय कार्रवाई की जा सकती है।

फिलहाल गर्भवती महिला के इलाज में कथित देरी, स्टाफ की विवादित टिप्पणी और पति के साथ मारपीट के आरोप जांच के विषय हैं। आधिकारिक जांच पूरी होने के बाद ही पूरे घटनाक्रम और जिम्मेदारी की स्थिति स्पष्ट हो सकेगी।

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