डेरा प्रमुख की रिहाई पर संत समाज में आक्रोश, सुरक्षा और नीति को लेकर हमला
डेरा सच्चा सौदा प्रमुख गुरमीत राम रहीम की पैरोल को लेकर एक बार फिर सियासी और सामाजिक विवाद गहरा गया है। इस बार छत्रपति के बेटे ने सरकार पर सीधा हमला बोलते हुए तीखी प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार ने जानबूझकर मामले से जुड़े अहम गवाहों की सुरक्षा हटाई, जिससे उनकी जान को खतरा बना हुआ है।
छत्रपति के बेटे ने कहा कि यह सिर्फ वोट बैंक की राजनीति तक सीमित नहीं रहा, बल्कि अब “नोट बैंक” का मुद्दा भी बन चुका है। उनका आरोप है कि प्रभावशाली लोगों को बार-बार पैरोल देकर कानून और न्याय व्यवस्था की विश्वसनीयता को कमजोर किया जा रहा है। उन्होंने सवाल उठाया कि गंभीर अपराधों में सजा काट रहे व्यक्ति को बार-बार राहत कैसे दी जा सकती है, जबकि पीड़ित परिवार और गवाह आज भी असुरक्षित महसूस कर रहे हैं।
उन्होंने यह भी कहा कि राम रहीम के मामलों में गवाहों ने अपनी जान जोखिम में डालकर सच्चाई सामने रखी थी। ऐसे में उनकी सुरक्षा हटाना न केवल अमानवीय है, बल्कि न्याय प्रक्रिया के साथ भी खिलवाड़ है। उनका मानना है कि सरकार को यह स्पष्ट करना चाहिए कि किन आधारों पर बार-बार पैरोल दी जा रही है और क्या इसमें राजनीतिक या आर्थिक दबाव शामिल है।
इस बयान के बाद प्रदेश की राजनीति में हलचल तेज हो गई है। विपक्षी दलों ने भी सरकार से जवाब मांगते हुए कहा कि कानून सबके लिए बराबर होना चाहिए। वहीं, समर्थक संगठनों का तर्क है कि पैरोल एक कानूनी प्रक्रिया है और इसे नियमों के तहत ही दिया जाता है।
कानूनी जानकारों का कहना है कि पैरोल का उद्देश्य कैदी को अस्थायी राहत देना होता है, लेकिन बार-बार दी जाने वाली रिहाई से सामाजिक असंतोष बढ़ सकता है। खासकर तब, जब मामला संवेदनशील हो और उससे जुड़े लोग आज भी खतरे में हों।
फिलहाल, छत्रपति के बेटे के बयान ने एक बार फिर राम रहीम की पैरोल और सरकार की नीति को कठघरे में खड़ा कर दिया है।
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