पंचकूला : चंडी मंदिर स्थित सशस्त्र सेना ट्रिब्यूनल (AFT) की रीजनल बेंच ने करीब 62 साल पुराने सैनिक पेंशन विवाद में 85 वर्षीय विधवा ब्रह्मा देवी को बड़ी राहत दी है। चरखी दादरी के फोगाट गांव निवासी ब्रह्मा देवी के पति चांदराम फोगाट सेना में सेवाएं दे चुके थे और द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान भी तैनात रहे थे। ट्रिब्यूनल ने उनकी सेवा अवधि को पेंशन के लिए निर्धारित न्यूनतम अवधि से अधिक मानते हुए संबंधित अधिकारियों को पेंशन तय करने के निर्देश दिए हैं।
चांदराम फोगाट 16 जून 1941 को सेना में भर्ती हुए थे। 5 मई 1947 को उन्हें पहली बार सेवा से मुक्त किया गया। इसके बाद 21 दिसंबर 1948 को वह आर्मी ऑर्डनेंस कोर में दोबारा भर्ती हुए और दिसंबर 1954 में सेवामुक्त हुए।
विवाद उनकी कुल क्वालिफाइंग सर्विस को लेकर था। सेना के रिकॉर्ड में उनकी बाद की सेवा 5 साल 327 दिन मानी जा रही थी, जो पेंशन के लिए जरूरी 15 साल की सेवा से काफी कम थी। इसी आधार पर लंबे समय तक पेंशन का दावा स्वीकार नहीं किया गया।
दूसरी ओर परिवार का दावा था कि चांदराम की पहली सैन्य सेवा और द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान की सेवा को भी पेंशन की गणना में शामिल किया जाना चाहिए। चांदराम ने 16 जून 1941 से 2 सितंबर 1945 तक द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान करीब 4 साल 2 महीने 17 दिन सेवा दी थी।
मामले में 30 अप्रैल 1951 के एक सरकारी नियम का महत्वपूर्ण आधार लिया गया। इसके अनुसार युद्धकाल की पात्र सेवा को पेंशन की गणना के लिए विशेष लाभ के साथ गिना जाना था। परिवार के अनुसार इसी आधार पर चांदराम की द्वितीय विश्व युद्ध की सेवा की गणना 8 साल 5 महीने से अधिक हुई। अन्य मान्य सेवा अवधि जोड़ने के बाद कुल क्वालिफाइंग सर्विस 16 साल 18 दिन मानी गई, जो पेंशन के लिए आवश्यक 15 वर्ष से अधिक है।
AFT के समक्ष चांदराम की पहली सेवा से संबंधित रिकॉर्ड भी पेश किया गया। इसमें जाट रेजिमेंट के 14 अप्रैल 2026 के रिकॉर्ड का उल्लेख किया गया, जिसमें 16 जून 1941 से 5 मई 1947 तक उनकी सैन्य सेवा दर्ज थी। ट्रिब्यूनल ने इस रिकॉर्ड को महत्वपूर्ण माना।
चांदराम फोगाट का वर्ष 1994 में निधन हो गया था। इसके बाद उनकी पत्नी ब्रह्मा देवी ने फैमिली पेंशन के लिए प्रयास जारी रखे। वर्ष 2020 के बाद उन्होंने सेना के अधिकारियों को पत्र भेजकर पेंशन की मांग की। दावा खारिज होने के बाद 2021 में उन्होंने सशस्त्र सेना ट्रिब्यूनल का दरवाजा खटखटाया।
चांदराम के बेटे सतप्रकाश फोगाट भी सेना में सूबेदार पद से सेवानिवृत्त हैं। परिवार के मुताबिक उन्हें वर्ष 1951 से संबंधित एक पत्र मिला था, जिसने द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान की सेवा को पेंशन गणना में शामिल कराने की कानूनी लड़ाई को आधार दिया।
परिवार का कहना है कि द्वितीय विश्व युद्ध में सेवा के लिए चांदराम को सम्मान भी मिला था। तत्कालीन सरकार की ओर से परिवार को सांवड़ गांव में करीब साढ़े 12 एकड़ जमीन आवंटित किए जाने की बात भी कही गई है। सेवामुक्त होने के बाद उन्हें युद्ध में सेवा के सम्मान स्वरूप एक छोटी राशि भी मिलती रही, जो समय के साथ बढ़ाई गई थी।
ब्रह्मा देवी ने अपनी याचिका में पति की पुरानी सेवा पेंशन के बकाए के साथ उनके निधन के बाद फैमिली पेंशन और ब्याज की मांग की थी। हालांकि ट्रिब्यूनल ने इतने पुराने मामले में पूरा एरियर देने की मांग स्वीकार नहीं की।
AFT ने सुप्रीम कोर्ट के वर्ष 2008 के Union of India & Others बनाम Tarsem Singh मामले के फैसले को आधार बनाते हुए एरियर को तीन साल की अवधि तक सीमित रखा। साथ ही संबंधित अधिकारियों को नियमानुसार पेंशन निर्धारित करने के निर्देश दिए।
करीब पांच साल तक चली कानूनी कार्यवाही के बाद आए इस फैसले से ब्रह्मा देवी और उनके परिवार को राहत मिली है। बेटे सतप्रकाश के मुताबिक परिवार कई दशकों से पेंशन का अधिकार हासिल करने का प्रयास कर रहा था और अब ट्रिब्यूनल के फैसले से उनकी लंबी लड़ाई को महत्वपूर्ण सफलता मिली है।
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