11 घंटे डिजिटल अरेस्ट का मामला, कोर्ट ने आरोपी को बताया समाज के लिए खतरा
पानीपत में सामने आए ₹1 करोड़ की साइबर ठगी के सनसनीखेज मामले में आरोपी बैंकर को कोर्ट से कोई राहत नहीं मिली है। अदालत ने आरोपी की जमानत याचिका खारिज करते हुए कहा कि इस तरह के अपराध समाज के लिए संभावित खतरा हैं और इन्हें हल्के में नहीं लिया जा सकता। कोर्ट के इस फैसले के बाद साइबर अपराध को लेकर सख्ती का साफ संदेश गया है।
मामले के अनुसार, आरोपी बैंकर पर आरोप है कि उसने अपने पद और तकनीकी जानकारी का दुरुपयोग करते हुए एक व्यक्ति को करीब 11 घंटे तक “डिजिटल अरेस्ट” में रखा। इस दौरान पीड़ित को डराया-धमकाया गया और विभिन्न बहानों से उसके बैंक खातों से करीब ₹1 करोड़ की रकम ठग ली गई। पीड़ित को लगातार वीडियो कॉल और फोन के जरिए मानसिक दबाव में रखा गया, ताकि वह किसी से संपर्क न कर सके।
जांच एजेंसियों ने कोर्ट को बताया कि आरोपी की भूमिका केवल एक सहयोगी तक सीमित नहीं थी, बल्कि वह ठगी की पूरी साजिश में सक्रिय रूप से शामिल था। आरोपी के बैंकिंग सिस्टम और प्रक्रियाओं की जानकारी ने अपराध को अंजाम देने में अहम भूमिका निभाई। यदि आरोपी को जमानत दी जाती है, तो वह सबूतों से छेड़छाड़ कर सकता है या अन्य लोगों को प्रभावित कर सकता है।
कोर्ट ने सुनवाई के दौरान टिप्पणी की कि साइबर अपराध तेजी से बढ़ रहे हैं और ऐसे मामलों में सख्त रुख अपनाना जरूरी है। अदालत ने कहा कि डिजिटल अरेस्ट जैसी घटनाएं आम नागरिकों में भय पैदा करती हैं और यह समाज की सुरक्षा के लिए गंभीर चुनौती हैं।
इस मामले के बाद पुलिस और साइबर सेल ने लोगों से अपील की है कि वे किसी भी संदिग्ध कॉल, वीडियो कॉल या सरकारी अधिकारी बनकर किए गए संपर्क से सतर्क रहें। किसी भी तरह की धमकी या दबाव की स्थिति में तुरंत पुलिस या साइबर हेल्पलाइन से संपर्क करें।
कुल मिलाकर, कोर्ट का यह फैसला साइबर ठगों और ऐसे अपराधों में शामिल लोगों के लिए कड़ा संदेश माना जा रहा है।
![]()











