पार्टी प्रतीकों के बिना कुलदीप बिश्नोई के दौरे, भाजपा से रिश्तों पर उठे सवाल

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Kuldeep Bishnoi

हरियाणा में पूर्व मुख्यमंत्री भजनलाल के बेटे और भाजपा नेता कुलदीप बिश्नोई के जनसंपर्क दौरों ने राजनीतिक चर्चा बढ़ा दी है। हिसार, सिरसा, जींद और कैथल में आयोजित कार्यक्रमों के मंच, बैनर और पोस्टरों पर भाजपा का नाम तथा चुनाव चिह्न दिखाई नहीं देने को लेकर सवाल उठ रहे हैं। हालांकि, बिश्नोई खुद को भाजपा में ही बता रहे हैं।

वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक डॉ. सतीश त्यागी इन गतिविधियों को राजनीतिक दबाव बनाने की रणनीति मानते हैं। उनका कहना है कि पार्टी प्रतीकों के बिना जनसभाएं और बंद कमरे की बैठकें बिश्नोई की स्वतंत्र राजनीतिक पहचान बनाए रखने का संकेत हो सकती हैं। यह विश्लेषकों का आकलन है; किसी नए राजनीतिक फैसले की घोषणा नहीं हुई है।

त्यागी के अनुसार, हाल के वर्षों में बिश्नोई परिवार को कई झटके लगे हैं। वर्ष 2024 के विधानसभा चुनाव में आदमपुर से भव्य बिश्नोई की हार परिवार के लिए महत्वपूर्ण नुकसान रही। हिसार लोकसभा टिकट नहीं मिलने और राज्यसभा में अवसर नहीं मिलने को भी वह कुलदीप खेमे की नाराजगी से जोड़ते हैं।

इसके अलावा, अखिल भारतीय बिश्नोई महासभा के संरक्षक पद से कुलदीप के हटने और उनके करीबी सहयोगी अजय प्रताप सिंह उर्फ बब्लू खटाना के जजपा में शामिल होने से राजनीतिक समीकरण प्रभावित हुए हैं।

कुलदीप बिश्नोई ने मोहन लाल बडोली और राज्यसभा सांसद रेखा शर्मा के बयानों पर भी नाराजगी जताई थी। इसके बाद मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी आदमपुर में भजनलाल जयंती कार्यक्रम में शामिल हुए। इस उपस्थिति को राजनीतिक स्तर पर संबंध सुधारने के प्रयास के तौर पर देखा गया।

विश्लेषकों के मुताबिक, बिश्नोई के सामने भाजपा में संगठन या सरकार में भूमिका हासिल करने, स्वतंत्र पहचान मजबूत करने और भविष्य के अन्य राजनीतिक विकल्प खुले रखने जैसे रास्ते हो सकते हैं। इनमें से किसी विकल्प पर उनकी ओर से औपचारिक घोषणा नहीं की गई है।

भजनलाल परिवार लंबे समय से सरकारी पदों से दूर रहा है। चंद्रमोहन बिश्नोई वर्ष 2005 से 2008 तक उपमुख्यमंत्री रहे थे। फिलहाल कुलदीप के दौरों और समर्थकों से संपर्क को लेकर चर्चा जारी है, लेकिन भाजपा से अलग होने की पुष्टि नहीं हुई है।

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