चोट के बाद अखाड़े में लौटे नितेश सिवाच ने जीता एशियाई खेलों में सिल्वर, परिवार में खुशी

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Nitesh Siwach

सोनीपत के जागसी गांव के पहलवान नितेश सिवाच ने एशियाई खेलों की ग्रीको-रोमन कुश्ती में सिल्वर मेडल हासिल किया है। फाइनल मुकाबले में उन्हें जापान के यूरी नकाजातो से हार का सामना करना पड़ा। उनकी उपलब्धि से परिवार में खुशी का माहौल है। इस सफलता तक पहुंचने के सफर में गंभीर चोट, अभ्यास से लंबा विराम और आर्थिक चुनौतियां भी शामिल रहीं।

नितेश के पिता आनंद ने बताया कि वह खुद पहलवानी करना चाहते थे, लेकिन उन्हें मौका नहीं मिला। उन्होंने बेटे को पहलवान बनाने का सपना देखा। वर्ष 2008 में करीब छह साल की उम्र में नितेश को गांव के अखाड़े में ले जाना शुरू किया। लगभग चार वर्षों तक वह सुबह-शाम बेटे को अभ्यास कराने ले जाते रहे। धीरे-धीरे नितेश की भी कुश्ती में रुचि बढ़ गई।

वर्ष 2012 में नितेश ने खरखौदा में पढ़ाई के साथ अभ्यास जारी रखा। हालांकि 2014 में प्रशिक्षण के दौरान घुटने में गंभीर चोट लगने से उनका सफर रुक गया। ऑपरेशन के बाद करीब एक साल तक उन्हें बिस्तर पर रहना पड़ा। पिता के मुताबिक, इस दौरान नितेश मानसिक रूप से भी परेशान रहने लगे थे।

चोट से उबरने के दौरान उन्होंने पिता के दूध कारोबार में हाथ बंटाया। करीब एक साल तक गांव से दूध लेकर पानीपत में दुकानों और घरों तक पहुंचाने का काम किया। बाद में उन्होंने पिता से दोबारा कुश्ती खेलने की इच्छा जताई। परिवार का सहयोग मिलने पर वर्ष 2017 में खरखौदा की एक निजी अकादमी में अभ्यास शुरू किया।

इसके बाद नितेश ने जिला, राज्य और राष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में पदक जीते। एक बार एशियाई खेलों के ट्रायल में बाहर होने के बावजूद उन्होंने तैयारी जारी रखी।

आनंद के अनुसार, परिवार के पास करीब तीन एकड़ जमीन थी। बेटे की पहलवानी पर बढ़ते खर्च को पूरा करने के लिए उन्होंने दूध का कारोबार शुरू किया। उस समय प्रशिक्षण और अन्य जरूरतों पर लगभग 15 हजार रुपए प्रतिमाह खर्च होते थे। परिवार अब पानीपत के सेक्टर-6 में रहता है। पिता ने बेटे की सफलता को लगातार मेहनत और परिवार के सहयोग का परिणाम बताया।

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