चंडीगढ़ : शहर में अलग-अलग वर्षों में महिलाओं की हत्या और कथित यौन हिंसा के मामलों की जांच आखिरकार DNA साक्ष्यों के जरिए एक टैक्सी ड्राइवर तक पहुंची। पुलिस के मुताबिक आरोपी मोनू की पहचान करने के लिए करीब 800 लोगों की प्रोफाइलिंग की गई और 100 से अधिक लोगों के DNA नमूनों की फोरेंसिक जांच कराई गई। आरोपी को तीन मामलों में अदालत से उम्रकैद की सजा सुनाई जा चुकी है और वह फिलहाल बुड़ैल जेल में बंद है।
इस पूरे मामले की शुरुआत 30 जुलाई 2010 की एक वारदात से हुई थी। सेक्टर-38 की रहने वाली 21 वर्षीय MBA छात्रा शाम को कोचिंग के लिए घर से निकली थी। सामान्य समय तक घर नहीं लौटने और संपर्क नहीं होने पर परिवार ने उसकी तलाश शुरू की।
परिजनों को सेक्टर-38 के टैक्सी स्टैंड के पास उसकी स्कूटी मिली। बाद में आसपास तलाश करने पर युवती गंभीर हालत में झाड़ियों के पास मिली। उसे PGI ले जाया गया, जहां डॉक्टरों ने मृत घोषित कर दिया। जांच में उसके साथ गंभीर यौन हिंसा और हत्या की बात सामने आई थी।
पुलिस ने घटनास्थल और मृतका से मिले फोरेंसिक साक्ष्यों को सुरक्षित कर DNA प्रोफाइल तैयार कराई, लेकिन लंबे समय तक आरोपी की पहचान नहीं हो सकी। जांच में कोई ठोस सुराग नहीं मिलने के कारण बाद में अदालत में अनट्रेस्ड रिपोर्ट दाखिल कर दी गई।
करीब 12 साल बाद जनवरी 2022 में मलोया के जंगल क्षेत्र में 40 वर्षीय महिला की हत्या का मामला सामने आया। महिला एक दिन पहले घर से लापता हुई थी। अगले दिन उसका शव जंगल क्षेत्र में मिला। जांच में इस मामले में भी गंभीर यौन हिंसा के संकेत मिले और पुलिस ने फोरेंसिक साक्ष्य सुरक्षित किए।
दोनों घटनाओं के तरीके और फोरेंसिक परिस्थितियों में समानता दिखने के बाद पुलिस ने पुराने रिकॉर्ड को दोबारा खंगालना शुरू किया। 2010 की MBA छात्रा और 2022 की महिला के मामलों में सुरक्षित DNA प्रोफाइल की तुलना की गई। पुलिस जांच में दोनों घटनाओं से प्राप्त DNA का संबंध एक ही व्यक्ति से होने की बात सामने आई।
इसके बाद पुलिस के सामने सबसे बड़ी चुनौती उस व्यक्ति की पहचान करना था। जांच टीम ने दोनों घटनास्थलों और आसपास के क्षेत्रों से जुड़े लोगों की बड़े स्तर पर प्रोफाइलिंग शुरू की। पुलिस के मुताबिक करीब 800 लोगों की जानकारी जुटाई गई। इनमें 2010 और 2022 के मामलों से प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से जुड़े संदिग्ध और संबंधित क्षेत्रों में रहने या काम करने वाले लोग शामिल थे।
फोरेंसिक जांच को आगे बढ़ाने के लिए बड़ी संख्या में DNA नमूने भी एकत्र किए गए। पुलिस ने प्रशासन और फोरेंसिक विशेषज्ञों के सहयोग से 100 से ज्यादा लोगों के नमूने जांच के लिए CFSL भेजे।
कई महीनों तक चली प्रक्रिया के बाद एक व्यक्ति की DNA प्रोफाइल 2022 के मामले से मिले DNA से मैच हुई। इसके बाद उसका मिलान 2010 के केस में सुरक्षित रखे गए DNA से कराया गया। पुलिस के मुताबिक वहां भी प्रोफाइल मैच हो गई।
इस फोरेंसिक सुराग के आधार पर पुलिस टैक्सी ड्राइवर मोनू तक पहुंची। हालांकि उसकी गिरफ्तारी आसान नहीं थी। पुलिस जांच में सामने आया कि वह मोबाइल फोन का नियमित इस्तेमाल नहीं करता था और उसके नाम से ऐसे डिजिटल रिकॉर्ड बेहद सीमित थे, जिनके जरिए तत्काल लोकेशन का पता लगाया जा सके।
पुलिस ने उसके पुराने ठिकानों और परिचितों के माध्यम से तलाश जारी रखी। कुछ समय बाद उसके चंडीगढ़ वापस आने की सूचना मिली और पुलिस ने उसे पकड़ लिया। पूछताछ के साथ DNA साक्ष्यों को जांच का अहम आधार बनाया गया।
इसी बीच फरवरी 2024 में करीब 60 वर्षीय महिला की हत्या और कथित यौन हिंसा का एक और मामला सामने आया था। महिला के लापता होने के बाद सेक्टर-54 के पास जंगलनुमा क्षेत्र में उसका शव मिला था। पुलिस ने इस मामले में भी फोरेंसिक साक्ष्य और DNA नमूने एकत्र किए।
जांच के दौरान इस वारदात की कड़ी भी मोनू तक पहुंची। इस तरह अलग-अलग वर्षों में सामने आए तीन गंभीर मामलों की जांच में आरोपी की भूमिका सामने आने का पुलिस ने दावा किया।
पूछताछ में आरोपी ने वारदातों को लेकर कई बातें पुलिस को बताई थीं। हालांकि किसी आरोपी का पुलिस के सामने कथित कबूलनामा अपने आप में दोषसिद्धि का एकमात्र आधार नहीं होता। मामलों में DNA और अन्य फोरेंसिक व परिस्थितिजन्य साक्ष्यों को अदालत के सामने पेश किया गया।
पुलिस जांच के दौरान आरोपी से हिमाचल प्रदेश के चंबा में वर्ष 2008 में एक बच्ची से जुड़े पुराने मामले को लेकर भी पूछताछ की गई थी। पुलिस के मुताबिक उसने उस मामले से जुड़ी जानकारी भी दी थी। उस पुराने प्रकरण का कानूनी रिकॉर्ड और उसमें हुई कार्रवाई अलग न्यायिक प्रक्रिया का विषय रही है।
चंडीगढ़ के मामलों में अदालत ने फोरेंसिक और अन्य साक्ष्यों के आधार पर आरोपी को दोषी ठहराया। तीनों मामलों में उसे उम्रकैद की सजा सुनाई गई है। आरोपी वर्तमान में चंडीगढ़ की बुड़ैल जेल में बंद है।
करीब डेढ़ दशक तक फैली इस जांच में DNA प्रोफाइलिंग सबसे महत्वपूर्ण कड़ी साबित हुई। पहले मामले में सुरक्षित रखे गए फोरेंसिक नमूनों की वजह से वर्षों बाद सामने आए दूसरे मामले से उसका संबंध स्थापित करने में जांच एजेंसी को मदद मिली और आखिरकार पुलिस आरोपी की पहचान तक पहुंच सकी।
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