सिरसा : पढ़ने और सीखने की कोई उम्र नहीं होती, इसे सिरसा के 85 वर्षीय लालचंद गोदारा ने साबित कर दिखाया है। सेना और हरियाणा रोडवेज में सेवाएं देने के बाद उन्होंने उम्र के उस पड़ाव पर पढ़ाई दोबारा शुरू की, जब आमतौर पर लोग आराम की जिंदगी बिताना पसंद करते हैं। लालचंद ने अब इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय (IGNOU) से एमए की पढ़ाई पूरी की है। परीक्षा में उन्हें 1200 में से 965 अंक मिले हैं। अब उनका लक्ष्य पीएचडी करना है।
नुहियांवाली गांव निवासी लालचंद गोदारा के दोबारा पढ़ाई शुरू करने के पीछे परिवार की एक सामान्य बातचीत प्रेरणा बन गई। उनके मुताबिक पोते-पोतियां अक्सर उनसे पूछते थे कि उन्होंने आगे की पढ़ाई क्यों नहीं की और वे अपने बेटों से भी कम पढ़े-लिखे क्यों हैं। लालचंद ने बच्चों की बात को नकारात्मक रूप से लेने के बजाय इसे चुनौती और प्रेरणा के रूप में लिया।
उन्होंने उम्र की परवाह किए बिना दोबारा किताबें उठाईं। वर्ष 2012 में उन्होंने मैट्रिक की पढ़ाई पूरी की। इसके बाद पढ़ाई का सिलसिला जारी रखा और वर्ष 2023 में IGNOU से बीए की डिग्री हासिल की। अब 85 वर्ष की उम्र में उन्होंने एमए भी पूरा कर लिया है।
लालचंद का कहना है कि शिक्षा जीवन में आगे बढ़ने के लिए रोशनी का काम करती है। उनका मानना है कि यदि मन में सीखने की इच्छा और लक्ष्य हासिल करने का जज्बा हो तो उम्र रास्ते की बाधा नहीं बनती। एमए के बाद भी वह अपनी पढ़ाई रोकने के पक्ष में नहीं हैं और अब पीएचडी करने की इच्छा रखते हैं।
लालचंद का जीवन केवल शिक्षा तक सीमित नहीं रहा है। उन्होंने सेना में भी सेवाएं दी हैं। उनके अनुसार वह वर्ष 1962 में सेना में भर्ती हुए और इसके बाद 1962, 1965 तथा 1971 के युद्धों के दौरान सैन्य सेवा में रहे।
सेना में सेवाएं देने के बाद वर्ष 1972 में उन्होंने हरियाणा रोडवेज में ड्राइवर के रूप में नौकरी शुरू की। लंबे सेवाकाल के दौरान उन्होंने विभिन्न जिम्मेदारियां निभाईं और वर्ष 2002 में यार्ड मास्टर के पद से सेवानिवृत्त हुए।
रिटायरमेंट के बाद उन्होंने पढ़ाई के साथ खेलों में भी सक्रियता बनाए रखी। लालचंद के अनुसार उन्होंने राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर की मास्टर एथलेटिक्स प्रतियोगिताओं में करीब 200 पदक हासिल किए हैं। इनमें लगभग 150 स्वर्ण, 30 रजत और 20 कांस्य पदक शामिल हैं।
85 वर्ष की उम्र में भी वह दौड़, गोला फेंक, हैमर और डिस्कस थ्रो जैसी खेल गतिविधियों में सक्रिय हैं। उनका कहना है कि वह नियमित अभ्यास करते हैं और रोजाना करीब 11 किलोमीटर दौड़ लगाते हैं। स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस पर आयोजित होने वाले जिला स्तरीय कार्यक्रमों की परेड में भी भाग लेते रहे हैं।
लालचंद के तीन बेटे हैं। परिवार की अगली पीढ़ी भी उच्च शिक्षा हासिल कर रही है। वह फिलहाल अपने छोटे बेटे के साथ नुहियांवाली गांव में रहते हैं। पोते-पोतियों से मिली पढ़ाई की प्रेरणा को उन्होंने अपने जीवन का नया लक्ष्य बना लिया।
मैट्रिक से बीए और फिर एमए तक पहुंचने के बाद लालचंद अब पीएचडी की तैयारी की दिशा में आगे बढ़ना चाहते हैं। उनका सफर इस बात का उदाहरण है कि दृढ़ इच्छाशक्ति, अनुशासन और लगातार प्रयास के जरिए उम्र के किसी भी पड़ाव पर शिक्षा से दोबारा जुड़ा जा सकता है।
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