मनुष्य अहंकार का त्याग करके प्रभु का स्मरण करें: कैवल्यानंद सरस्वती गोवर्धन लीला और गोपीगीत के प्रसंगों ने मोहा श्रद्धालुओं का मन

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Safidon News
सफीदों, (एस• के• मित्तल) : श्री कृष्ण भक्ति भागवत समिति के तत्वावधान में पितृ पक्ष के उपलक्ष्य में नगर के ऐतिहासिक नागक्षेत्र सरोवर परिसर में आयोजित श्रीमद्भागवत कथा महोत्सव में श्रद्धालुओं का उत्साह देखते ही बन रहा है। कथा के दौरान कथा व्यास पीठाधीश्वर परम स्वामी कैवल्यानंद सरस्वती महाराज ने भगवान श्रीकृष्ण की विभिन्न लीलाओं का भावपूर्ण वर्णन करते हुए श्रद्धालुओं को भक्ति, अहंकार त्याग और भगवान की शरणागति का संदेश दिया। कथा के दौरान महारास लीला का प्रसंग सुनाते हुए स्वामी कैवल्यानंद सरस्वती महाराज ने कहा कि भगवान श्रीकृष्ण ने जितनी गोपियां थीं, उतने ही स्वरूप धारण कर प्रत्येक गोपी के साथ रास किया। महारास जब चरम पर पहुंचा तो गोपियों के मन में अपने सौंदर्य और सौभाग्य का अभिमान उत्पन्न हो गया। उन्हें लगा कि भगवान श्रीकृष्ण उनके साथ हैं, इसलिए वे विशेष हैं। स्वामी जी ने कहा कि भगवान को किसी भी प्रकार का अभिमान पसंद नहीं है। इसी भाव को दूर करने के लिए भगवान श्रीकृष्ण राधा जी सहित गोपियों की आंखों से ओझल हो गए। भगवान के अचानक अदृश्य हो जाने पर गोपियां व्याकुल होकर उन्हें खोजने लगीं। वे कभी तुलसी के पौधे से तो कभी पीपल सहित अन्य वृक्षों से श्रीकृष्ण के बारे में पूछती रहीं। भगवान के विरह में गोपियों की व्याकुलता बढ़ती गई और उन्होंने श्रीकृष्ण के प्रेम में जो विरह गीत गाया, वही गोपीगीत कहलाया। स्वामी जी ने कहा कि भगवान के प्रति सच्ची भक्ति और प्रेम से किया गया स्मरण भक्त के जीवन को आध्यात्मिक आनंद से भर देता है। उन्होंने गोवर्धन पूजा और गोवर्धन लीला का प्रसंग सुनाते हुए बताया कि जब ब्रजवासियों ने भगवान श्रीकृष्ण के कहने पर इंद्र के स्थान पर गोवर्धन महाराज की पूजा की, तो इंद्र देव नाराज हो गए। उन्होंने मेघों को घनघोर बारिश करने का आदेश दिया। लगातार वर्षा से ब्रजवासी भयभीत हो गए। ऐसे संकट के समय भगवान श्रीकृष्ण ने अपनी छोटी उंगली पर गोवर्धन पर्वत को धारण कर लिया और सभी ब्रजवासियों को अपने गाय-बछड़ों सहित उसके नीचे आश्रय दिया। कथा व्यास ने बताया कि सात दिन और सात रात तक वर्षा होती रही, लेकिन भगवान की शरण में आए ब्रजवासियों को कोई नुकसान नहीं हुआ। उन्होंने कहा कि भगवान की लीला में भक्तों की रक्षा और उनके प्रति करुणा का भाव प्रमुख है। अंततः जब इंद्र को अपनी भूल का एहसास हुआ तो वे भगवान श्रीकृष्ण के चरणों में पहुंचे और अपनी भूल के लिए क्षमा याचना की। स्वामी कैवल्यानंद सरस्वती महाराज ने श्रद्धालुओं से आह्वान किया कि वे भगवान श्रीकृष्ण की लीलाओं से प्रेरणा लेते हुए का त्याग करें, सच्ची श्रद्धा के साथ प्रभु का स्मरण करें और अपने जीवन में धर्म, प्रेम तथा सेवा के भाव को अपनाएं। कथा के उपरांत श्रद्धालुओं में छप्पन भोग का प्रसाद वितरित किया गया।

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