सिख गुरुओं ने धर्म रक्षा के लिए दिए बलिदान: बचन सिंह आर्य
सफीदों, (एस• के• मित्तल) : नगर के गैस एजेंसी रोड स्थित गुरुद्वारा बाग समाधा में मंगलवार को आस्था, परंपरा और उल्लास के साथ बैसाखी पर्व मनाया गया। इस पावन अवसर पर बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने गुरुद्वारे में पहुंचकर मत्था टेका और समाज की सुख-समृद्धि की कामना की। कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में पूर्व मंत्री बचन सिंह आर्य ने शिरकत की। गुरुद्वारा प्रबंधन की ओर से जत्थेदार हरवैल सिंह ने बचन सिंह आर्य को सिरोपा भेंट कर सम्मानित किया। कार्यक्रम के दौरान आए रागी जत्थों ने गुरबाणी का मधुर कीर्तन कर संगत को मंत्रमुग्ध कर दिया। उन्होंने सिख गुरुओं द्वारा धर्म की रक्षा के लिए दिए गए बलिदानों की गाथाएं सुनाईं, जिससे पूरा वातावरण भक्ति और भावनाओं से सराबोर हो गया। अपने संबोधन में जत्थेदार हरवैल सिंह ने संगत को बताया कि खालसा पंथ की स्थापना के साथ ही गुरु जी ने सिखों को कंघा, कड़ा, केश, कच्छा और कृपाण धारण अर्थात पंज ककार करने का संदेश दिया, जो आज भी सिख पहचान का अहम हिस्सा हैं। अपने संबोधन में बचन सिंह आर्य ने कहा कि 14 अप्रैल 1699 का दिन सिख इतिहास में स्वर्ण अक्षरों में अंकित है, जब गुरु गोबिंद सिंह जी ने खालसा पंथ की स्थापना की थी। इसी दिन से बैसाखी पर्व मनाने की परंपरा शुरू हुई और यह पंजाबी नववर्ष का भी प्रतीक है। उन्होंने बताया कि इस दिन गुरु जी ने पंज प्यारों को अमृतपान करवाकर एक नई धार्मिक और सामाजिक चेतना का संचार किया। उन्होंने आगे कहा कि गुरु तेग बहादुर के बलिदान के समय गुरु गोबिंद सिंह जी मात्र 15 वर्ष के थे, लेकिन इस घटना ने उन्हें भीतर तक झकझोर दिया। उन्होंने समाज को अत्याचारों से मुक्त कराने के लिए लोगों में नैतिक शक्ति और साहस भरने का संकल्प लिया। कार्यक्रम के अंत में श्रद्धालुओं ने गुरु का अटूट लंगर ग्रहण किया, जिसमें हजारों लोगों ने प्रसाद लिया।

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गुरुद्वारा बाग समाधा का ऐतिहासिक महत्व
सफीदों स्थित गुरुद्वारा बाग समाधा ऐतिहासिक और धार्मिक दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण स्थल है। यह स्थान महाराजा गजपत सिंह की समाधि के लिए प्रसिद्ध है, जो जींद रियासत के राजा और महाराजा रणजीत सिंह के नाना थे। यह गुरुद्वारा आज श्रद्धालुओं की आस्था का प्रमुख केंद्र बन चुका है, जहां सिख ही नहीं बल्कि अन्य धर्मों के लोग भी आकर शीश नवाते हैं और आशीर्वाद प्राप्त करते हैं।
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