चंडीगढ़ में नए किराया कानून को लेकर विवाद गहराता जा रहा है। असम टेनेंसी एक्ट को लागू करने के फैसले को हाईकोर्ट में चुनौती दी गई है, जिसके बाद अदालत ने प्रशासनिक व्यवस्था और कानूनी प्रक्रिया पर गंभीर सवाल उठाए हैं। सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने पूछा कि तहसीलदारों को अदालत जैसी शक्तियां देकर किरायेदारी विवादों का निपटारा कैसे कराया जा सकता है।
याचिकाकर्ताओं का तर्क है किराया विवाद न्यायिक प्रकृति के मामले होते हैं और इनके समाधान के लिए उचित कानूनी प्रक्रिया तथा न्यायिक अनुभव जरूरी होता है। ऐसे में प्रशासनिक अधिकारियों को अदालत जैसी जिम्मेदारी देना कानून और न्याय व्यवस्था के सिद्धांतों के खिलाफ माना जा रहा है। इस मुद्दे पर अदालत ने भी सरकार से विस्तृत जवाब मांगा है।
हाईकोर्ट ने सुनवाई के दौरान यह भी जानना चाहा कि क्या तहसीलदारों के पास ऐसे मामलों को संभालने के लिए पर्याप्त कानूनी प्रशिक्षण और अधिकारिक ढांचा मौजूद है। अदालत ने संकेत दिए कि न्यायिक और प्रशासनिक कार्यों के बीच संतुलन बनाए रखना जरूरी है ताकि किसी पक्ष के अधिकार प्रभावित न हों।
मामले को लेकर किरायेदारों और मकान मालिकों दोनों में चर्चा बनी हुई है। कुछ लोग मानते हैं कि नया कानून विवादों के तेज निपटारे में मदद कर सकता है, जबकि कई विशेषज्ञ इसे न्यायिक प्रक्रिया में हस्तक्षेप के रूप में देख रहे हैं। कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि यदि इस प्रकार के अधिकार प्रशासनिक अधिकारियों को दिए जाते हैं तो भविष्य में अन्य मामलों में भी ऐसे सवाल उठ सकते हैं।
फिलहाल हाईकोर्ट में मामले की सुनवाई जारी है और आने वाले समय में इस पर बड़ा फैसला सामने आ सकता है। इस मुद्दे को लेकर चंडीगढ़ में कानूनी और प्रशासनिक हलकों में लगातार चर्चा बनी हुई है।
![]()











