श्रीमद्भागवत का मूल संदेश भगवान के प्रति विश्वास है: स्वामी कैवल्यानंद सरस्वती कथा में सुनाया रुक्मिणी विवाह व स्यमंतक मणि का प्रसंग

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Safidon News
सफीदों, (एस• के• मित्तल) : श्री कृष्ण भक्ति भागवत समिति के तत्वावधान में पितृ पक्ष के उपलक्ष्य में नगर के ऐतिहासिक नागक्षेत्र सरोवर परिसर में आयोजित श्रीमद्भागवत कथा महोत्सव में श्रद्धालु भगवान श्रीकृष्ण की विभिन्न लीलाओं का श्रवण कर भावविभोर हो रहे हैं। कथा व्यास पीठाधीश्वर परम स्वामी कैवल्यानंद सरस्वती महाराज ने भगवान श्रीकृष्ण की लीलाओं का भावपूर्ण वर्णन करते हुए श्रद्धालुओं को भक्ति, अहंकार त्यागने और भगवान की शरणागति का संदेश दिया। कथा के दौरान महारास लीला सहित भगवान श्रीकृष्ण और रुक्मिणी विवाह का प्रसंग सुनाते हुए स्वामी कैवल्यानंद सरस्वती महाराज ने कहा कि कुण्डिनपुर के महाराज भीष्मक की पुत्री रुक्मिणी ने भगवान श्रीकृष्ण का चित्र देखकर ही उन्हें अपने पति के रूप में स्वीकार कर लिया था। लेकिन उनके भाई रुक्मी ने रुक्मिणी का विवाह शिशुपाल से तय कर दिया। रुक्मिणी ने भगवान श्रीकृष्ण को एक पत्र लिखकर विश्वसनीय ब्राह्मण देव के माध्यम से संदेश भेजा कि कुछ ही दिनों में उनका विवाह शिशुपाल से होने वाला है, जबकि उन्होंने मन ही मन श्रीकृष्ण को अपना पति स्वीकार कर लिया है। रुक्मिणी की पुकार सुनकर भगवान श्रीकृष्ण वहां पहुंचे और उन्हें अपने साथ ले गए। इसके बाद विधि-विधान के साथ भगवान श्रीकृष्ण और रुक्मिणी का विवाह संपन्न हुआ। कथा व्यास ने कहा कि यह प्रसंग भगवान के प्रति अटूट विश्वास और समर्पण का संदेश देता है। इसके बाद उन्होंने स्यमंतक मणि का प्रसंग सुनाया। उन्होंने बताया कि सत्राजित के पास एक दुर्लभ मणि थी। भगवान श्रीकृष्ण को जब इस मणि के बारे में जानकारी मिली तो वे उसे लेने के लिए गए, लेकिन सत्राजित ने मणि देने से मना कर दिया। कुछ समय बाद सत्राजित का भाई मणि धारण करके शिकार के लिए जंगल गया, जहां एक शेर ने उसे मार दिया। इसके बाद सत्राजित ने भगवान श्रीकृष्ण पर ही अपने भाई की हत्या कर मणि हासिल करने का आरोप लगा दिया। आरोप से दुखी भगवान श्रीकृष्ण सत्य सामने लाने के लिए जंगल पहुंचे। वहां एक गुफा से अद्भुत प्रकाश दिखाई दिया। गुफा में प्रवेश करने पर उनका सामना त्रेता युग के महान भक्त जामवंत से हुआ। मणि को लेकर भगवान श्रीकृष्ण और जामवंत के बीच कई दिनों तक युद्ध हुआ। जब जामवंत थक गए तो उन्होंने भगवान के वास्तविक स्वरूप को पहचानते हुए उनसे राम रूप में दर्शन देने की प्रार्थना की। भगवान ने उन्हें राम रूप में दर्शन दिए। यह देखकर जामवंत भावविभोर हो गए और उन्होंने अपनी पुत्री जामवती तथा स्यमंतक मणि भगवान को अर्पित कर दी। कथा व्यास ने बताया कि भगवान श्रीकृष्ण जब मणि लेकर सत्राजित के पास पहुंचे तो उसे अपनी गलती का अहसास हुआ और वह ग्लानि से भर गया। उसने भगवान से क्षमा मांगी तथा अपनी पुत्री सत्यभामा का विवाह भगवान श्रीकृष्ण के साथ कर दिया। कथा के अंत में स्वामी कैवल्यानंद सरस्वती ने कहा कि श्रीमद्भागवत का मूल संदेश भगवान के प्रति विश्वास और भक्ति है। शुकदेव जी महाराज प्रत्येक प्रसंग के माध्यम से यही समझाते हैं कि हे परीक्षित! अपने प्रभु पर विश्वास रखो, भगवान का नाम भजो और निरंतर उनका सुमिरन करो। जब मनुष्य अहंकार छोड़कर भगवान की शरण में जाता है तो उसके जीवन में भक्ति और शांति का मार्ग प्रशस्त होता है।

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