फरीदाबाद में लूट के एक मामले की जांच को लेकर पुलिस कार्रवाई पर सवाल खड़े हो गए हैं। कोर्ट में सुनवाई के दौरान जिस पिस्टल को पुलिस ने मामले में अहम सबूत के तौर पर पेश किया था, जांच में वह कथित तौर पर डमी यानी नकली निकली। इसके बाद लूट के आरोपी को अदालत से राहत मिल गई। हथियार की वास्तविकता सामने आने के बाद पुलिस की जांच और सबूत जुटाने के तरीके पर भी सवाल उठने लगे हैं।
मामले में पुलिस ने आरोपी के खिलाफ लूट से जुड़ी कार्रवाई करते हुए पिस्टल की बरामदगी को महत्वपूर्ण साक्ष्य बताया था। जांच एजेंसी की ओर से हथियार को केस से जोड़कर अदालत के सामने रखा गया। हालांकि बाद में जांच के दौरान यह स्पष्ट हुआ कि बरामद पिस्टल असली नहीं बल्कि डमी थी।
हथियार के नकली पाए जाने के बाद अदालत में अभियोजन पक्ष के सामने मामले को साबित करने को लेकर मुश्किलें बढ़ गईं। बचाव पक्ष ने भी इसी बिंदु को आधार बनाकर आरोपी को राहत देने की मांग की। अदालत ने उपलब्ध साक्ष्यों और मामले की परिस्थितियों को देखते हुए आरोपी के पक्ष में फैसला दिया।
इस घटनाक्रम के बाद पुलिस की कार्रवाई को लेकर कई सवाल उठ रहे हैं। खास तौर पर यह चर्चा है कि जिस हथियार को केस में महत्वपूर्ण सबूत माना गया, उसकी जांच शुरुआती स्तर पर ही क्यों नहीं की गई। किसी आपराधिक मामले में बरामद हथियार की वास्तविकता और उसकी फॉरेंसिक जांच को महत्वपूर्ण प्रक्रिया माना जाता है।
मामले ने पुलिस की जांच प्रक्रिया, सबूतों की पुष्टि और केस डायरी में दर्ज तथ्यों को लेकर भी चर्चा पैदा कर दी है। अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि पुलिस या जांच से जुड़े अधिकारी इस मामले में सामने आई खामी को लेकर क्या कदम उठाते हैं।
फिलहाल आरोपी को अदालत से मिली राहत के बाद मामले की जांच पर सवाल बने हुए हैं। यदि आगे की जांच में किसी स्तर पर लापरवाही सामने आती है तो संबंधित अधिकारियों की जिम्मेदारी भी तय की जा सकती है। इस मामले में अदालत की कार्यवाही और जांच से जुड़े अगले कदम पर अब सभी की नजर है।
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