रेवाड़ी में आय से अधिक संपत्ति केस में पूर्व आबकारी अधिकारी बरी, कोर्ट ने कहा- अभियोजन के लिए जरूरी वैधानिक मंजूरी नहीं

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Rewari Court

रेवाड़ी : आय से अधिक संपत्ति के मामले में रेवाड़ी की विशेष अदालत ने गांव रसगण निवासी एवं आबकारी एवं कराधान विभाग के तत्कालीन कर्मचारी विक्रम सिंह को बरी कर दिया है। अदालत ने मामले में भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत अभियोजन के लिए आवश्यक वैधानिक मंजूरी उपलब्ध नहीं होने को महत्वपूर्ण आधार माना। मामला वर्ष 2016 में हुई जांच से संबंधित है।

भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो की जांच में विक्रम सिंह पर अपनी ज्ञात आय के मुकाबले 15 लाख 33 हजार 430 रुपए अधिक खर्च करने का आरोप लगाया गया था। जांच के दौरान उनकी आय, बैंक खातों, संपत्ति, ऋण, जीपीएफ निकासी और विभिन्न वित्तीय लेनदेन की पड़ताल की गई थी।

जांच रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2004 से 2016 के बीच विक्रम सिंह की कुल आय 23 लाख 68 हजार 401 रुपए आंकी गई थी। इसी अवधि में उनका कुल खर्च 39 लाख एक हजार 831 रुपए बताया गया। दोनों के अंतर के आधार पर जांच एजेंसी ने 15 लाख 33 हजार 430 रुपए आय से अधिक खर्च किए जाने का आरोप लगाया था।

विक्रम सिंह आबकारी एवं कराधान विभाग में कार्यरत रहे और बाद में सहायक आबकारी एवं कराधान अधिकारी के पद तक पदोन्नत हुए। जांच के दौरान उनके बयान भी दर्ज किए गए थे।

जांच में वर्ष 2006 में एक ग्रुप हाउसिंग सोसाइटी में किए गए निवेश का भी उल्लेख किया गया। रिपोर्ट के मुताबिक सोसाइटी में 25 सदस्य थे और प्रत्येक सदस्य द्वारा 25 हजार रुपए जमा किए जाने की बात सामने आई थी।

इसके अलावा जांच एजेंसी ने फ्लैट और प्लॉट से संबंधित लेनदेन, बैंक खातों, जीपीएफ से निकाली गई राशि, ऋण, चेक और नकद लेनदेन की भी पड़ताल की। रेवाड़ी के सेक्टर-9 स्थित हाउसिंग कॉरपोरेशन के फ्लैट नंबर-101, प्लॉट नंबर-10 का भी जांच रिपोर्ट में उल्लेख किया गया, जिसकी कीमत करीब 33.50 लाख रुपए बताई गई थी।

जांच में वेतन, जीपीएफ, बैंक ऋण, पत्नी से प्राप्त राशि, ससुर से मिली रकम और अन्य स्रोतों को आय की गणना में शामिल किया गया था। दूसरी तरफ फ्लैट, जमीन, वाहन और अन्य मदों में हुए खर्च को भी जांच का हिस्सा बनाया गया।

विक्रम सिंह की ओर से पैरवी कर रहीं एडवोकेट आरती हंस के अनुसार जांच पूरी होने के बाद उनके खिलाफ मुकदमा चलाने के लिए सक्षम प्राधिकारी से आवश्यक मंजूरी मांगी गई थी। मंजूरी के मुद्दे को लेकर बाद में दोबारा पत्राचार भी हुआ।

मामले को 27 अगस्त 2026 को पुनर्विचार के लिए सक्षम प्राधिकारी के पास भेजे जाने की बात भी सामने आई। बचाव पक्ष के अनुसार इस दौरान जांच एजेंसी की रिपोर्ट में कोई नया तथ्य अथवा नया साक्ष्य सामने नहीं आया था।

मामले पर सुनवाई करते हुए अदालत ने भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत अभियोजन के लिए आवश्यक वैधानिक मंजूरी के प्रावधान पर विचार किया। कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के विभिन्न फैसलों का उल्लेख करते हुए पाया कि वर्तमान मामले में जरूरी मंजूरी उपलब्ध नहीं थी।

इसी आधार पर विशेष न्यायाधीश सौरभ कुमार की अदालत ने विक्रम सिंह की अर्जी स्वीकार करते हुए उन्हें मामले से बरी कर दिया। अदालत ने जमानत बांड और जमानतदार बांड को नियमानुसार छह महीने तक जारी रखने का आदेश भी दिया है, ताकि आवश्यकता पड़ने पर अपीलीय अदालत के समक्ष उनकी उपस्थिति सुनिश्चित की जा सके।

इस तरह वर्ष 2004 से 2016 की अवधि में ज्ञात आय के मुकाबले 15.33 लाख रुपए अधिक खर्च करने के आरोप से जुड़े मामले में अभियोजन के लिए आवश्यक वैधानिक मंजूरी का अभाव महत्वपूर्ण आधार बना। अदालत का फैसला आरोपों के वित्तीय तथ्यों पर अंतिम गुण-दोष निर्धारण के बजाय अभियोजन की वैधानिक मंजूरी से जुड़े आधार पर आया है।

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