कॉमनवेल्थ गेम्स में गोल्ड मेडल जीतकर देश का नाम रोशन करने वाली हरियाणा की बॉक्सर जैस्मिन की सफलता के पीछे संघर्ष, धैर्य और लगातार मेहनत की लंबी कहानी है। एक समय ऐसा भी था जब उनके दादा ने उन्हें बॉक्सिंग करने से मना कर दिया था। हालांकि परिवार के अन्य सदस्यों ने उन्हें आगे बढ़ने के लिए प्रेरित किया और उनके सपनों का पूरा समर्थन किया।
जैस्मिन ने शुरुआती दिनों में कई चुनौतियों का सामना किया। एशियाई खेलों (एशियाड) में मिली हार उनके लिए बड़ा झटका थी, लेकिन उन्होंने हार को अपनी कमजोरी नहीं बनने दिया। लगातार अभ्यास, अनुशासन और आत्मविश्वास के दम पर उन्होंने वापसी की और आखिरकार कॉमनवेल्थ गेम्स में स्वर्ण पदक जीतकर अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाया।
खेल के साथ-साथ जैस्मिन अपनी पढ़ाई भी जारी रखे हुए हैं। वह फिजिकल एजुकेशन में पीजी डिप्लोमा कर रही हैं, ताकि खेल और शिक्षा दोनों क्षेत्रों में खुद को आगे बढ़ा सकें। उनका मानना है कि शिक्षा और खेल का संतुलन खिलाड़ियों के भविष्य के लिए बेहद महत्वपूर्ण होता है।
जैस्मिन की इस उपलब्धि से पूरे हरियाणा में खुशी का माहौल है। खेल प्रेमियों और प्रदेशवासियों ने उनकी जीत पर गर्व व्यक्त करते हुए उन्हें भविष्य की प्रतियोगिताओं के लिए शुभकामनाएं दी हैं। उनकी सफलता ने एक बार फिर साबित किया है कि दृढ़ संकल्प और कड़ी मेहनत से हर चुनौती को पार किया जा सकता है।
विशेषज्ञों का कहना है कि जैस्मिन की यात्रा युवा खिलाड़ियों के लिए प्रेरणा है। कठिन परिस्थितियों और असफलताओं के बावजूद उन्होंने अपने लक्ष्य पर ध्यान बनाए रखा और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत को स्वर्ण पदक दिलाया।
अब जैस्मिन की नजर आगामी अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं पर है। खेल प्रेमियों को उम्मीद है कि वह भविष्य में भी भारत के लिए इसी तरह शानदार प्रदर्शन कर देश का गौरव बढ़ाती रहेंगी।
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