सफीदों, (एस• के• मित्तल) : नगर के राजकीय नर्सिंग कॉलेज में नर्सिंग छात्राओं से किताबों के नाम पर पैसे वसूले जा रहे हैं। छात्रों को बिना एमआरपी वाली महंगी भाव कि किताबें खरीदने के लिए मजबूर किए जा रहा है। इस गंभीर मुद्दे को लेकर विद्यार्थियों ने चिकित्सा शिक्षा एवं अनुसंधान विभाग, पंचकूला के निदेशक को गुमनाम शिकायत भेजी है। शिकायत के बाद विभाग हरकत में आया और जांच के आदेश दिए गए। जांच में कई चौंकाने वाले खुलासे हुए हैं। ऐसे में कॉलेज प्रशासन की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े हो गए हैं। शिकायत में नर्सिंग विद्यार्थियों ने आरोप लगाया कि कॉलेज में कुछ विशेष किताबों को अनिवार्य कर दिया गया है। जबकि उन पर कोई एमआरपी अंकित नहीं है, ना ही ये किताबें बाजार में पुस्तक विक्रेताओं के पास उपलब्ध है। छात्रों को एक निश्चित स्रोत से ही इन्हें खरीदने के लिए मजबूर किया जा रहा है। विद्यार्थियों का कहना है कि इन किताबों की कीमत अत्यधिक है, जिससे आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों से आने वाले छात्रों पर अतिरिक्त बोझ पड़ रहा है। छात्रों ने यह भी आरोप लगाया कि यदि कोई विद्यार्थी इन किताबों की कीमत या उपलब्धता पर सवाल उठाता है, तो उस पर किताबें खरीदने का दबाव बनाया जाता है। क्योंकि यह किताबें कॉलेज के ही दंपति स्टाफ दोबारा छपाई गई। कई मामलों में तो इन किताबों की फोटोकॉपी करवाना भी इतना महंगा पड़ता है कि छात्र असहाय महसूस करते हैं। विद्यार्थियों ने निदेशक से मांग की थी कि इस मामले की निष्पक्ष जांच कर उचित कार्रवाई की जाए, ताकि उन्हें अपनी जरूरत के अनुसार उचित मूल्य पर किताबें खरीदने की स्वतंत्रता मिल सके।
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निदेशक ने कॉलेज की प्राचार्या को पत्र लिखकर दो दिनों में मांगी थी रिपोर्ट
मामले की गंभीरता को देखते हुए उप निदेशक (नर्सिंग), निदेशक चिकित्सा शिक्षा एवं अनुसंधान, हरियाणा ने राजकीय नर्सिंग कॉलेज की प्राचार्या को पत्र लिखकर दो दिनों के भीतर रिपोर्ट मांगी थी। इसके बाद कॉलेज प्रशासन हरकत में आया और 6 जुलाई को प्राचार्या सुदेश चौधरी द्वारा एक जांच कमेटी का गठन किया गया। जिसमें दो दिन के भीतर रिपोर्ट सौंपने के निर्देश दिए गए। जांच कमेटी ने रिपोर्ट तैयार करके उसे 8 जुलाई को चिकित्सा शिक्षा एवं अनुसंधान विभाग, पंचकूला के निदेशक को भेजा। इस रिपोर्ट में कई अहम तथ्य सामने आए।
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जांच में क्या आया सामने
जांच रिपोर्ट में खुलासा हुआ कि कॉलेज प्रशासन को पहले से यह जानकारी थी कि छात्राओं को दी जा रही किताबों पर एमआरपी अंकित नहीं है, इसके बावजूद यह प्रक्रिया लंबे समय से लगातार जारी रही। रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2019 से एक ही पब्लिशर, जेपी ब्रदर्स की किताबें सभी कक्षाओं में अनिवार्य रूप से लगवाई जा रही थीं और छात्रों को बाहर से किताबें खरीदने की अनुमति नहीं दी जाती थी। छात्र-छात्राओं ने कई बार इस व्यवस्था का विरोध किया और बाजार से किताबें खरीदने की इच्छा जताई, लेकिन उन्हें साफ तौर पर मना कर दिया गया और कहा गया कि किताबें केवल कॉलेज के माध्यम से ही उपलब्ध करवाई जाएंगी। जांच में यह भी सामने आया कि वितरित की गई कई किताबें पाठ्यक्रम स्तर से ऊपर की थीं। उदाहरण के तौर पर जीएनएम कम्युनिटी बुक का जिक्र किया गया। इसके अलावा कुछ किताबों में ऐसे शिक्षकों के नाम रिव्यूअर के तौर पर दर्ज थे, जिनकी विषय में विशेषज्ञता नहीं थी। रिपोर्ट में एक और गंभीर पहलू यह सामने आया कि एक किताब में कॉलेज की ही अनुबंधित एसोसिएट प्रोफेसर राजकुमारी गुनिसाना का नाम लेखक और रिव्यू कमेटी में शामिल था, जिससे हितों के टकराव के आरोप लगे हैं। वहीं, छात्रों को दी जाने वाली प्रैक्टिकल नोटबुक्स पर भी कोई एमआरपी अंकित नहीं थी और उनकी कीमत को लेकर पारदर्शिता नहीं बरती गई। जांच में यह भी पाया गया कि पब्लिशर का मुख्य सेलर सीधे कॉलेज परिसर में आकर अध्यापकों से संपर्क करता था, जबकि उसे ऐसा न करने के निर्देश दिए गए थे। इसके बावजूद वह अपनी बिक्री बढ़ाने के उद्देश्य से सक्रिय बना रहा। साथ ही 24 जून 2026 को कोटेशन प्रक्रिया पूरी होने से पहले ही प्रैक्टिकल बुक्स मंगवाकर छात्राओं को वितरित कर दी गईं, जिन पर भी एमआरपी नहीं थी। रिपोर्ट में स्पष्ट कहा गया है कि पूरे मामले में पारदर्शिता की कमी रही और छात्रों के आर्थिक शोषण की आशंका है। मामला सामने आने के बाद कॉलेज प्रशासन ने तत्काल कदम उठाते हुए निर्णय लिया कि अब छात्र अपनी किताबें स्वयं बाजार से खरीदेंगे और केवल भारतीय नर्सिंग परिषद (INC) के सिलेबस के अनुसार ही पढ़ाई होगी। साथ ही संबंधित पब्लिशर को भविष्य में किताबें उपलब्ध न कराने की चेतावनी भी दी गई है। रिपोर्ट में उच्च अधिकारियों से अनुरोध किया गया है कि छात्रों के हित में सख्त और उचित कार्रवाई की जाए।
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क्या कहती हैं कॉलेज प्राचार्या
इस मामले में कॉलेज प्राचार्या सुदेश चौधरी का कहना है कि मामला संज्ञान में आते ही उन्होंने जांच रिपोर्ट तैयार करके उच्चाधिकारियों को भेज दी है। कॉलेज के 3 पब्लिशर है। तीनों को बोल दिया गया कि भविष्य में एमआरपी के साथ किताबें भिजवाएं। वहीं छात्र-छात्राएं को भी कहा गया है कि एमआरपी वाली किताबें ही खरीदें। जो अन्य पब्लिशर कॉलेज में आते थे, उनको बैन कर दिया गया है। 664 नर्सिंग विद्यार्थियों को ये किताबें दी गई थी, जिसके बाद अभिभावकों की शिकायतें आनी शुरू हो गई थी। 

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